भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १०३ )

उस्ताद जौकने भी ठीक ऐसी ही बात कही है :—

हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।

जाना तो यह जाना, कि न जाना कुछ भी ।

वाहटेयर नामक पाश्चात्य विद्वान्ने भी ऐसी ही बात कही है—“The more we have read, the more we have learned, the more we have medicated, the better conditioned we are to affirm that we know nothing.” अधिकाधिक पढ़ने, सीखने और विचारनेसे हमें कहना पड़ता है कि, हम तो कुछ भी नहीं जानते । किसी ने ठीक ही कहा है—“अक्ष विद्यो महागर्वी” थोड़ी विद्यावाला बहुत घमण्डी होता है । पर जब वह विद्वानोंकी संगतिसे और सीखता समझता है, तब उसका नशा किरकिरा हो जाता उसे मानना पड़ता है कि, मैं तो एकदम मूर्ख हूँ—मैं तो अभी कुछ भी नहीं जानता ।

छप्पय ।

जब हों समझौ नैक, तबहि सर्वज्ञ भयो हौ ।

जैसे गज सदमत्त, अंधता छाय गयो हौ ।

जब सतसंगति पाय, कछुक हों समझन लाग्यौ ।

तबहि भयो अति गूढ़, गर्व गुणको सब भाग्यौ ।

हों=मैं । नैक=थोड़ासा । सर्वज्ञ=सब जाननेवाला । गज=हाथी ।