वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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werable in breaking down the vanity of our adversary in literary discussions. It thou art served by men hankering after wealth, we too are waited upon by people who are desirous of listening to our learned discourses for the sake of dispelling the ignorance from their minds. If thou dost not care for us, we too cherish no regard for thee. Look, we are off ?
यदा किञ्चिञ्जोऽहं द्विप इव मदान्यः समभवं
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलितं मम मनः ।
यदा किंचिर्किंचिदुभजनसकाशादवगतं
तदा सूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥३१॥
जब मैं बहुत थोड़ासा जानता था, तब हाथीके समान मदसे अन्ध्या हो रहा था ; मैं समझता था, कि मैं सर्वज्ञ हूँ । जब सुभे बुद्धिमानोंकी सुहृदत्ते कुछ मालूम हुआ ; तब मैंने समझा, कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता । मेरा भूढ़ा मद ज्वरकी तरह उतर गया ॥३१॥
जो लोग बहुत थोड़ा ज्ञान रखते हैं, समझते हैं कि, हम सब जानते हैं—दुनियाकी सारी अबल हममें ही है, हमारे सिवा और सब पशु हैं । अल्पज्ञताके कारण उन्हें बड़ा घमण्ड रहता है ; किन्तु जब वे बुद्धिमान् और विद्वानोंकी सुहृदत्तमें आते हैं और कुछ सीख जाते हैं ; तब वे समझते हैं, कि हम तो कुछ भी नहीं जानते थे, हमारा अभिमान मिथ्या था । उस समय उनका अभिमान हवा हो जाता है ।