भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १०१ )

सेवन्ते त्वां धनान्या मतिललहतये मामपि श्रोतुकामा

मध्यन्यास्या न चैतत्त्वयि मम सुतरामेष राजन्नातोऽस्मि ॥२०॥

यदि तुम धनके स्वामी हो, तो हम वार्णिके स्वामी हैं। यदि तुम युद्ध करनेमें वीर हो, तो हम अपने प्रतिपक्षियोंसे शास्त्रार्थ करके उनका मद-ज्वर तोड़ने में कुशल हैं। यदि तुम्हारी सेवा धन-कामी या धनान्ध करते हैं, तो हमारी सेवा अज्ञान-अन्धकारका नाश चाहनेवाले, शास्त्र सुननेके लिए करते हैं। यदि तुम्हें हमारी जरा भी गरज नहीं है, तो हमें भी तुम्हारी बिल्कुल गरज नहीं है। लो, हम भी चलते हैं ॥३०॥

छप्पय ।

तुम अवनी के ईश, ईश हमहूँ वार्णिके ।

तुम हौ रण में धीर, वीर गाढे अति जीके ।

ल्यौही विद्यावाद करत, हमहूँ नहिं हारे ।

प्रतिपक्षके मान मार, अपने विस्तारे ।

धन-लोभी नर सेवत तुम्हें, हमको शिव श्रोता भले ।

तुमको न हमारी चाह, तो हमहूँ ब्यासे उठ चले ॥३०॥

30. O king, if thou art the lord of the wealth, we too are the lord of speech. If thou art brave in fight, our pluck too is unans-

श्ववनी=पृथ्वी। इश=स्वामी। विद्यावाद=शास्त्रार्थ। प्रतिपक्षी=विपक्षी=मुखालिफ। श्रोता=घुनने वाले। ब्यासे=इसे जगहसे।