भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( १०१ )

सेवन्ते त्वां धनान्या मतिललहतये मामपि श्रोतुकामा

मध्यन्यास्या न चैतत्त्वयि मम सुतरामेष राजन्नातोऽस्मि ॥२०॥

यदि तुम धनके स्वामी हो, तो हम वार्णिके स्वामी हैं। यदि तुम युद्ध करनेमें वीर हो, तो हम अपने प्रतिपक्षियोंसे शास्त्रार्थ करके उनका मद-ज्वर तोड़ने में कुशल हैं। यदि तुम्हारी सेवा धन-कामी या धनान्ध करते हैं, तो हमारी सेवा अज्ञान-अन्धकारका नाश चाहनेवाले, शास्त्र सुननेके लिए करते हैं। यदि तुम्हें हमारी जरा भी गरज नहीं है, तो हमें भी तुम्हारी बिल्कुल गरज नहीं है। लो, हम भी चलते हैं ॥३०॥

छप्पय ।

तुम अवनी के ईश, ईश हमहूँ वार्णिके ।

तुम हौ रण में धीर, वीर गाढे अति जीके ।

ल्यौही विद्यावाद करत, हमहूँ नहिं हारे ।

प्रतिपक्षके मान मार, अपने विस्तारे ।

धन-लोभी नर सेवत तुम्हें, हमको शिव श्रोता भले ।

तुमको न हमारी चाह, तो हमहूँ ब्यासे उठ चले ॥३०॥

30. O king, if thou art the lord of the wealth, we too are the lord of speech. If thou art brave in fight, our pluck too is unans-

श्ववनी=पृथ्वी। इश=स्वामी। विद्यावाद=शास्त्रार्थ। प्रतिपक्षी=विपक्षी=मुखालिफ। श्रोता=घुनने वाले। ब्यासे=इसे जगहसे।

( १०२ )

werable in breaking down the vanity of our adversary in literary discussions. It thou art served by men hankering after wealth, we too are waited upon by people who are desirous of listening to our learned discourses for the sake of dispelling the ignorance from their minds. If thou dost not care for us, we too cherish no regard for thee. Look, we are off ?

यदा किञ्चिञ्जोऽहं द्विप इव मदान्यः समभवं

तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलितं मम मनः ।

यदा किंचिर्किंचिदुभजनसकाशादवगतं

तदा सूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥३१॥

जब मैं बहुत थोड़ासा जानता था, तब हाथीके समान मदसे अन्ध्या हो रहा था ; मैं समझता था, कि मैं सर्वज्ञ हूँ । जब सुभे बुद्धिमानोंकी सुहृदत्ते कुछ मालूम हुआ ; तब मैंने समझा, कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता । मेरा भूढ़ा मद ज्वरकी तरह उतर गया ॥३१॥

जो लोग बहुत थोड़ा ज्ञान रखते हैं, समझते हैं कि, हम सब जानते हैं—दुनियाकी सारी अबल हममें ही है, हमारे सिवा और सब पशु हैं । अल्पज्ञताके कारण उन्हें बड़ा घमण्ड रहता है ; किन्तु जब वे बुद्धिमान् और विद्वानोंकी सुहृदत्तमें आते हैं और कुछ सीख जाते हैं ; तब वे समझते हैं, कि हम तो कुछ भी नहीं जानते थे, हमारा अभिमान मिथ्या था । उस समय उनका अभिमान हवा हो जाता है ।

( १०३ )

उस्ताद जौकने भी ठीक ऐसी ही बात कही है :—

हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।

जाना तो यह जाना, कि न जाना कुछ भी ।

वाहटेयर नामक पाश्चात्य विद्वान्ने भी ऐसी ही बात कही है—“The more we have read, the more we have learned, the more we have medicated, the better conditioned we are to affirm that we know nothing.” अधिकाधिक पढ़ने, सीखने और विचारनेसे हमें कहना पड़ता है कि, हम तो कुछ भी नहीं जानते । किसी ने ठीक ही कहा है—“अक्ष विद्यो महागर्वी” थोड़ी विद्यावाला बहुत घमण्डी होता है । पर जब वह विद्वानोंकी संगतिसे और सीखता समझता है, तब उसका नशा किरकिरा हो जाता उसे मानना पड़ता है कि, मैं तो एकदम मूर्ख हूँ—मैं तो अभी कुछ भी नहीं जानता ।

छप्पय ।

जब हों समझौ नैक, तबहि सर्वज्ञ भयो हौ ।

जैसे गज सदमत्त, अंधता छाय गयो हौ ।

जब सतसंगति पाय, कछुक हों समझन लाग्यौ ।

तबहि भयो अति गूढ़, गर्व गुणको सब भाग्यौ ।

हों=मैं । नैक=थोड़ासा । सर्वज्ञ=सब जाननेवाला । गज=हाथी ।

( १०४ )

ज्वर-चर्दत-चर्दत अति ताप ज्यों; उत्तरत, सीतल होत तन ।

ल्योही मनकों मद उत्तरियों, लियों शील-सन्तोष-पन ॥३१॥

31. As long as I knew only very little I was blind with madness like an elephant and my mind was filled with the idea that I knew all. But when I came to learn a little by intercourse with wise men, my false conceit vanished away with the realisation that I knew nothing.

अतिकान्तः कालो लटभलनाभोगसुभगो

अमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ ।

इदानीं स्वःसिन्धोस्तदधुवि समाकन्दनगिरः

सुतौरैः फल्कौरैः शिवशिवशिवेति प्रतमुमः ॥३२॥

जेवरोसे सजी हुई स्त्रियोंके भोगने-योग्य जवानी चली गई ; और हम चिरकाल तक विषयोंके पीछे दौड़ते-दौड़ते थक भी गये । अब हम पवित्र जाहन्वी-तट पर, (ललचाने वाली) स्त्रियोंकी निन्दा करते हुए, शिव-शिव जपेंगे ॥३२॥

जिस पुरुषको, स्त्रियोंकी असलियत मालूम हो जानेसे, चिरकि हो गयी है ; वह कहता है—अब हमारी स्त्रियोंके भोगने-योग्य अवस्था—जवानी चली गई । अब वह लौटकर आयेगी नहीं, और यह बुढ़ापा जायगा नहीं । यह बला जवानोंमें ही

मदमत्त=मतवाला । कलुङ्ग=कुल्लू । हों=मैं । तबहि=तभी । सीतल=शीतल=ठण्डा । तन=शरीर । गर्वगुणको=विद्या या गुणका वृत्तगढ़ ।

( १०५ )

अच्छी लगती है—यह बीमारी जवानीमें ही जोर करती है। किसीने ठीक ही कहा है:—

इरकूका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन ।

यह यज्ञ करता है शिद्ध, इन्हीं अय्याममें खास ॥

अब तो बुढ़ापेका दौरदौरा है, इस उम्रमें हम नाज़नियोंके साथ ऐसा कर भी नहीं सकते। इसके सिवा, अब हम सावधान भी हो गये हैं। हमने बेवकूफ़ों छोड़ दी है। हम बहुत दिनोंतक विषयोंमें ठीन रहे, हमने बहुत कुछ विषय-भोग भोगे; अब हम उनसे थक गये, उनसे हमारा जी ऊब गया। उनसे हमें कुछ भी सुख नहीं मिला। इसलिये अब हम गङ्गा-जीके किनारे बैठकर, संसार-बन्धनकी मूल और नरकको नसेनी सुन्दरियोंकी ममता छोड़, शिवसे प्रीति करेंगे और दिन-रात उन्हींका पवित्र एवं कल्याणकारी नाम जपेंगे, जिससे हमारा अन्तकाल तो सुधर जाय।

दोहा ।

रमणकाल यौवन गयो, थक्यो अमृत संसार ।

देहूँ गंगतट शेष वय, शिव-शिव जपत विसार ॥३२॥

इरकू=प्रेम । मञ्जु=रोग । शिद्ध=जोर । अय्याम=दिन । रमणकाल=स्त्री-भोग करनेका समय । यौवन=जवानी । अमृत=भटकते-भटकते । गंगतट=गंगाके किनारे । शेष वय=बाकी उम्र ।

( १०६ )

32. The time of our youth, when we were fit for enjoying the company of jewel-bedecked women, has gone. We are tired of hankering after the pleasures of the world for a long time, Now we will pass our days on the holy banks of the heavenly Ganges cursing the misleading guiles of women and repeating the name of the Great Shiva in prayer.

माने म्लायिनि स्मृदिद्वे च वसुनि व्यर्थ प्रयातेऽर्थिनि

जीणे वन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्थावने ।

शुक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जहत्तुकन्यापयः-

पूतप्रावगिरीन्द्रकन्दरदुरीकुञ्जोनिवासः क्वचित् ॥ ३३ ॥

जब लोगोमें इज्जत-आनर न रहे; धन नाश हो जाय; याचक लौट-लौट कर जाने लगे; भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और नाते-रिश्तेदार मर जायें; तब बुद्धिमानको चाहिए, कि किसी ऐसे पर्वत की गुहाके कोनेमें जा बसे, जिसके पत्थर गंगाजीके जलसे पवित्र हो रहे हों ॥३३॥

जब लोगोमें अपना मान न रहे, लोग नफ़रतकी नज़रसे देखने लगे, अपनी धन-दौलत जाती रहे; जो याचक पहले कुछ पाते थे, वे अब निर्धनताके कारण विमुख हो-होकर लौट आते हों; भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्र प्रभृति नातेदार दूसरी दुनियाको बढे गये हों, तब तो बुद्धिमानको चाहिये कि संसारको त्याग दे; इसमें मोह न रखे और किसी ऐसे पहाड़की गुफामें जा

( १०७ )

रहे, जिसके पत्थरोंको पवित्र गङ्गाजल पखार-पखारकर पवित्र करता हो। ऐसी हालतमें, संसारमें रहना—धूषा समय खोना है। कम-से-कम उस समय तो बुद्धिमान् एकान्तमें बैठकर, सब तरहकी आशा-तृष्णा छोड़कर, भगवान्के चरणकमलोंमें मन लगावे।

दोहा ।

गयो मान यौवन सुधन, भिजुक जात निराश ।

अब तौ मोकों उचित यह, श्रीगंगा तट वास ॥३३॥

33. When all our respect has gone, our riches have flown away, when the poor and the needy who came to us for help before and were given what they wanted have begun to be sent away with refusal, when all our relations and dear ones have left this world, it is but desirable for a wise man to take up his abode somewhere in the corner of some mountain-cave whose stones are washed by the holy waters of the Ganges.

परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा

प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्षेकलिलम् ॥

प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे

विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ॥३४॥

हे मलिन मन ! तू पराये दिलको प्रसन्न करनेमें किसलिए लगा रहता है ? यदि तू तृष्णाको छोड़कर सन्तोष करले, अपने

( १०८ )

में ही सन्तुष्ट रहे, तो तू स्वयं चिन्तामणि-स्वरूप हो जाय । फिर तेरी कौनसी इच्छा पूरी न हो ? ॥३४॥

मन ही सब कामोंका कर्ता है । सभी इन्द्रियां मनके ही अधीन और मनकी ही अनुगामिनी हैं । मन ही बन्धन और मोक्षका कारण है । मनुष्य मनसे ही पाप-पुण्य और दुःख-सुख प्रभृतिका भागी होता है । मन ही मनुष्यको बुढ़ा-भला, साधु-असाधु सब कुछ बना देता है । मनकी वृत्ति सुधरनेसे ही, मनके वासना-हीन होनेसे ही, सब कुछ त्यागनेसे हो, वह आत्मसाक्षात्कारके योग्य हो जाता है ; इसी लिये कोई ज्ञानी पुरुष मनको सम्बोधन करके कहता है,—

“अरे मन ! तू स्वयं तो मलिन और दुःखके भारसे दबा हुआ है ; फिर तू औरोंके दिल खुश करनेकी इतनी कोशिशें क्यों करता है, क्यों आफूमें उडाता है, क्यों मान खोता है और क्यों अपमान सहता है ? इससे तुझे क्या लाभ होगा ? मेरी बात माने तो तू इच्छाको त्याग दे, किसी भी चीज़की इच्छा मत रख ; तब तुझे शान्ति मिलेगी—परमानन्दकी प्राप्ति होगी । जब तू चिन्तामणिकी भाँति स्वच्छ हो जायगा, जब तू अपने स्वरूपको पहचान जायगा ; तब तुझे आत्मसाक्षात्कार हो जायगा, तुझे ब्रह्मज्ञान हो जायगा, तू ब्रह्मके प्रेममें लीन हो जायगा, हर्ष-विषाद और शोक-मोह तेरे पास न आवेंगे, अष्ट-सिद्धि और नवनिद्धि तेरे सामने हाथ बाँधे खड़ी रहेंगी । उस समय तेरी कोई अभिलाषा पूरी हुए बिना बाकी न रहेगी ।

( २०६ )

इसी लिये कहता हूँ, कि तु दूसरोंको राजी करनेकी अपेक्षा अपने तर्क ही राजी कर, इससे तुझे निश्चय ही उसकी प्राप्ति होगी, जिसके समान त्रिलोकियोंमें और कोई नहीं है। जिस समय उसकी अनुपम छवि तेरी आँखोंमें समा जायगी, उस समय तुझे और कुछ अच्छा न लगेगा ; केवल वही अच्छा लगेगा। महाकवि रहीमने कहा है—

प्रीतम-छवि नयनन बसी, पर-छवि कहाँ समाय ।

भरी सराय “रहीम” लखि, आप पथिक फिर जाय ॥

जब आँखोंमें प्यारे कृष्णकी सुन्दर मनमोहिनी छवि समा जाती है, तब उनमें और किसीकी छवि समा नहीं सकती। जबतक नयनोंमें मुगली मनोहरकी छवि नहीं समाती, नयन उसकी छविसे खाली रहते हैं, तभीतक मामूली छवि उनमें समाती रहती है। जिस तरह सरायको भरी हुई देख कर, उसमें कोठरियाँ खाली न पाकर, मुसाफिर लौट जाते हैं ; उसी तरह नयनोंमें मनमोहनकी बाँकी छवि देखकर और संसारी मिथ्या खूबसूरतियाँ नयनोंके पास भी नहीं फटकतीं। जब दिलमें परम प्यारे कृष्णका डेरा लग जाता है, तब उसमें सुन्दरी कामिनियाँ और लक्ष्मी प्रभृति किसीको भी स्थान नहीं मिलता ; अर्थात् दिलको उसके मुकाबलेमें संसारके अच्छे-से-अच्छे पदार्थ—स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृति—तुच्छातितुच्छ जँचते हैं।

( ११० )

मतलब यह है कि, मनुष्य अज्ञानतासे भटकता है, अलौक सुख पानेके लिये वृथा नीचांकी षुशामद करता है। जिस सुखके लिये वह इतनी आफूत उठाता है, उस सुखका सच्चा सोता स्वयं उसके दिलमें मौजूद है। किसी पाश्चात्य विद्वान्ने ए. व. कहा है—“The source of true happiness is inherent in the heart ; he is a fool who seeks it elsewhere” सच्चे सुखका सोता दिलके अन्दर मौजूद है। जो उसे अन्यत्र खोजता-फिरता है, वह मूर्ख है। निश्चय ही सुख मनमें है और मनके निरोधसे वह मिलता है। जिसका चित्त स्थिर है, उसे सदा सुख है ; जिसका चित्त स्थिर नहीं, उसे सुख नहीं ; अतः मनुष्यो ! भटकना छोड़कर सन्तोषकी शरण गहो ; निश्चय ही आपको अपने भीतर ही परम सुख-शान्ति मिलेगी।

दोहा ।

तूही रीक्षत क्यों नहीं, कहा रिक्षवत और ? ।

तेरेही आनन्दसे, चिन्तामणि सब ठौर ॥३४॥

34. O my unhappy mind, why dost thou try to enter into the hearts of others by doing thy utmost to please them while thou art thyself heavy with the burden of afflictions. If thou becomest contented by giving up thy desires, wilt not thou gain all thou wantest, when all the good qualities of a pure mind are produced within thyself like a Chintamani which has the power of giving everything that a man desires ?

( १११ )

भोगे रोगभयं कुलेच्छुतिभयं विते नृपालाङ्गयम् मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणैः खलभयं काये कृताताङ्गयं सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यभेवाभयम् ॥३५॥

विषयेके भोगनेमें रोगोंका डर है, कुलमें दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, चुप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, शास्त्रोंमें विपत्तियोंके बाद का भय है, गुणोंमें दुष्टोंका भय है, शरीरमें मौतका भय है ; संसारकी सभी चीजोंमें मनुष्योंके भय है । केवल “वैराग्य”में किसी प्रकारका भय नहीं है ॥३५॥

यदि मनुष्य विषय-सुखोंको भोगता है, तो उसे रोगोंका भय रहता है । यदि चन्द्रन आदि शीतल पदार्थोंका लेपन किया जाता है, तो बाढ़ी हो जाती है । यदि स्त्रीसे मैथुन किया जाता है, तो बल घटता है और बहुत करनेसे क्षय रोग हो जाता है । यदि उच्च कुलमें जन्म होता है, तो सदा उसके पतन या उसमें कोई दोष होनेका डर लगा रहता है, क्योंकि कुलमें किसीके भी दुराचारी होनेसे कुलका नाम बदनाम हो जाता है अथवा प्लोग वगैरःके होनेसे कुलका नाम डूब ही जाता है । इसी तरह अधिक धन होनेसे राजाका डर लगा रहता है, कि कहीं राजा सारा धन न छीन ले । चुप

( ११२ )

रहनेमें अपतिष्ठा और दीनताका भय रहता है, क्योंकि सुषुप्त रहने वालेको सभी दीन-हीन समझ लेते हैं। संश्राममें शत्रुओं का भय रहता है। यदि सूरत सुन्दर होती है, तो सूरतके बिगड़ जानेका भय रहता है; बुढ़ापेमें रूप-रङ्ग नष्ट हो ही जाता है। शास्त्रोंके जानने वालेको प्रतिपक्षियोंका भय रहता है, क्योंकि प्रतिपक्षी सदा उसे नीचा दिखाना और उसका अपमान करना चाहते हैं। पुण्य या सद्गुणोंमें दुष्टोंका भय रहता है; दुष्ट लोग अच्छे-से-अच्छे कामोंमें दोष निकाल कर, उनका उद्घाटन अर्थ लगाने लगते हैं; वे निन्दा या अपवाद करके गुणीके गुणोंका मूल्य घटानेकी भरपूर चेष्टा किया करते हैं। शरीरको मृत्युका भय रहता है, क्योंकि कायाका नाश अवश्यभूामी है। जो शरीरमें आया है, जिसने यह शरीर रूपी वस्त्र पहना है; उसे अपना शरीर छोड़ना ही होगा—यह चोला बदलना और नया पहनना ही होगा।

इस तरह विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि मनुष्य को सांसारिक सभी पदार्थोंमें भय-ही-भय है। फिर भय किसमें नहीं है? केवल “वैराग्य या त्याग अथवा संन्यास” ही ऐसा है, जिसमें किसी भी बातका भय नहीं है।

यों तो संसारमें जरा भी सुख नहीं—सर्वत्र भय-ही-भय है; पर दुष्ट और नीचोंका भय सबसे भारी है। दुष्टोंसे तंग होकर ही, महाकवि गालिब आदमियोंको वस्तीमें भी बसना पसन्द नहीं करते और कहते हैं:—

( ११३ )

रहिए अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो ।

हमसखुन कोई न हो, और हमजवों कोई न हो ॥ १ ॥

वे दूरो दीवार सा, इक घर बनाना चाहिए ।

कोई हमसाथा न हो, और पासवों कोई न हो ॥ २ ॥

पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार ।

और अगर भर जाइए, तो नोहावों कोई न हो ॥ ३ ॥

संसारमें जरा भी सुख नहीं है, सर्वत्र भय-ही-भय है । एक को एक खानेको दौड़ता है । जिसे देखो वही जला मरता है । यहाँ ईर्षा-द्वेषका बाजार जोरोंसे गर्म रहता है, इस वास्ते ऐसी जगहमें चलकर रहना चाहिये, जहाँ कोई न हो ; हमारी बात कोई न समझे और हम किसीकी न समझे । मकान भी ऐसा ही हो, जिसमें दरवाजे और दीवार न हों ; अर्थात् साफ जड़ल हो । न हमारा कोई साथी हो, न पड़ोसी ; अगर बीमार हो जायँ, तो कोई खबर लेनेवाला और तीमारदारी या सेवा-शुश्रूषा करनेवाला न हो । अगर सौभाग्यसे भर जायँ, तो कोई शोक करनेवाला भी न हो ।

हमसखुन=हम-जैसा कलाम कहने वाला । हमजवों=हमारी भाषा बोलने वाला । दर=द्वार, दरवाजा । दूरो=दूर+ओ=दूरवाजा और । दीवार=भीत । हमसाथा=पड़ोसी । पासवों=साथ रहने वाला । गर=अगर । तीमारदार=सेवा-दृष्टि करनेवाला । नोहावों=शोक करने वाला, रोनेवाला ।

( १२४ )

महात्मा सुन्दर दासने भी कहा है :—

सर्प डसे, सु नहीं कछु तालक ;

बीछु लगे, सु भले करि मानौ ॥

सिंह हु खाय, तु नाहिँ कछु डर ;

जो गज मारत, तौ नहिं हानौ ॥

आगि जरी, जल बूढ़ि मेरा, गिरि

जाइ गिरी ; कछु भै मत आनौ ॥

“सुन्दर” और भले सब ही यह ;

दुर्जन-संग भलो जिन जानौ ॥

सुन्दरदासजी कहते हैं, अगर आपको साँप डसे, बिच्छू काटे और हाथी मारे तो कुछ हज मत समझो। आगमें जलने, जलमें डूबने और पहाड़से गिरनेमें भी कोई हानि न समझो, ये सब भले हैं—इनसे हानि नहीं ; हानि और खतरा है दुष्टकी संगतिमें, इसलिये दुर्जनकी सुहबत मत करो। उसकी संगति अच्छी नहीं ; पर आजकल दुष्टोंकी बहुतायत है ; कदम-कदम पर दुर्जनोंके दर्शन होते हैं। इसलिये संसारसे दुःखित और उदासान

सप डसे=साँप काटे। कछु तालक=कुछ चिन्ता। बीछु=बिच्छू। लगे=काटे। भलो करि मानौ=अच्छा समझो। सिंह हु=सिंह भी, और भी। तु=तो। गज=हाथी। हानौ=हानि=नुकसान। आगि= आग। जरी=जलो। बूढ़ि मेरा=डूब मेरा। गिरि=पड़त। भ= भय, डर। आना=समझो। जिन=मत।

( ११५ )

मनुष्यके लिए वनमें जाकर रहनेमें ही शान्ति है। इत-पंक्तियोंके लेखकको भी, जो अनेक बार ऐसा ही चाहते लगता है, इस संसारसे दिल लगाना—इसमें रहना, अच्छा नहीं मालूम होता ; पर, बकौल उस्ताद ज़ौक, कुछ मजबूरी ऐसी आ पड़ती है, कि सरता नहीं। आपने फरमाया है,—

बेहतर तो है यहीं, कि न दुनियासे दिल लगे ।

पर क्या करें, जो काम न बे-दिल्ली चले ॥

संसारसे दिल लगाना अच्छा नहीं ; पर क्या करें, बिना दिल लगाये चलता भी तो नहीं ।

सारांश यह है कि, यदि सख्की सुख-शान्ति चाहते हो ; तो खी-पुत्र, धन-दौलत और ज़मीन-जायदादकी ममता छोड़ कर वैराग्य ले लो ; यानी इन सबको छोड़कर वनमें जा बसो और एक मात्र परमात्मामें मन लगाओ। संसारको त्यागनेके सिवा, सुखकी और राह नहीं। हमने अनेक बार संसार त्यागनेका इरादा किया, पर हमारे अज्ञानी मनने हमें ऐसा करनेसे बारम्बार रोका। हम मनकी बातोंको विचारके कंटि पर तोलते रहे। अब हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि, मनकी सलाह ठीक नहीं। हमारा गन्दा मन हमें शैतानकी तरह गुमराह कर रहा है। जिस सुखकी खोजमें हमने ५१ वर्ष

बेहतर=भला। न दुनियासे दिल लगे=जगज्जालमें मन न फंसे ; दुनियादारीमें न फंसे। बे-दिल्ली=बिना दिल लगाये ॥

( १३६ )

योंही गवा दिये, उस सुखका लेश भी हमें न मिला। इस जगत्में, हमें सदा शोक-तापोंसे जलना पड़ा। हमारी सुबुद्धि हमसे कह रही है कि, शौतानके भरमानेमें मत आओ। जो ऊकरी काम करने हैं, उन्हें जल्दी-से-जल्दी निपटा कर, सबको तबाह बनको चले जाओ और मनको शुद्ध करके परमात्मा में लगाओ। दैर न करो; कहीं ऐसा न हो कि, तुम अपने काम ही निपटाते रहो और काल आ पहुँचे; और तुम्हारे मनकी मनमें रह जाय। मनकी राह पर न चलो, बल्कि मनको अपनी राह पर चलाओ। “सच्चा सुख वैराग्यमें ही है” इस महावाक्यको क्षणभर भी न भूलो।

व्यप्य ।

बहुत भोगको संग, तहाँ इन रोगनको डर ।

धनहूँ को डर भूप, अग्नि अरु त्योहीं तस्कर ।

सेवामें भय स्वामि, समरमें शत्रुनको भय ।

कुलहमें भय नारि, देहको काल करत ज्ञय ।

अभिमान डरत अपमान सों, गुन डरपत सुन खल-शबद ।

सब गिरत परत भयसों भरे, अभय एक “वैराग्यपद” ॥ ३५ ॥

35. In the enjoyment of pleasure there is always the fear of disease. Membership in a high family is accompanied by thy fear

भूप=राजा। तस्कर=चोर। स्वामि=मालिक। समर=लड़ाई।

नारि=ब्री, करन ज्ञय=नाश करता है। अभय=निर्भयता।

( ११० )

of the latter's downfall. Wealth is ever haunted by the fear of kings. Silence is associated with the fear of neglect and dishonour. In strength there is the fear of enemies. A handsome appearance is always in fear of being disfigured in old age. Learning and science have the fear of antagonistic discussions. Good qualities suffer from the fear of evil-minded persons, who will do their best to lower the value of a man possessed of them by slander etc. The body is beset with the fear of death. Thus everything in this world pertaining to man is associated with fear. Renunciation alone is free from such associations.

अमीषां प्राणानां तुलितविस्मिनीपत्रपयसां

छते किं नास्माभिर्विगलितविवेकैर्व्यवसितम् ॥

यदाव्यानामघे द्रविणमदनःशंकमनसां

कर्तुं वीतब्रीहेर्निजगुणकथापातकमपि ॥ ३६ ॥

कमल-पत्र पर जलकी बूँदोंके समान चञ्चल प्राणोंके लिए; हमने घुरे और भलेका विचार न करके, क्या-क्या काम नहीं किये ? हमने धन-मदसे मतवाले लोगोंके सामने निर्लज्ज होकर अपने गुणोंके कीर्तन करनेका पाप तक किया ॥ ३६ ॥

अथवा—

कमलके पत्तेपर ठहरी हुई जलकी बूँदके समान क्षणभङ्गुर प्राणोंके लिये ; मूर्खातावश, धनमदसे निःशंक धनी मनुष्योंके सामने, बेहया होकर, अपनी तारीफ़ आप करनेका घोर पाप करनेवाले हमलेगोनें कौनसा पाप नहीं किया ?

( ११८ )

कहने वाला कहता है कि इस जीवनके लिए, जो नितान्त क्षणभंगुर है, जिसकी स्थिरता कुछ भी नहीं है, मैंने कोई उपाय—कोई उद्यम उठा न रक्खा। और तो और ; इस शुद्ध जीवनके लिए, अपनी तारीफ आप करनेका महापातक भी मैंने किया ; और वह भी ऐसे लोगोंके सामने, जो धनके मद से मतवाले हो रहे थे और जो किसी की ओर आँख उठाकर भी न देखते थे। हाय ! ये सब अकर्म करने पर भी मेरा मनोरथ सिद्ध न हुआ !

संसारमें अपने गुणोंका आप बखान करना—बड़ा भारी पाप समझा जाता है। आत्मश्लाघा या आत्मप्रशंसा वास्तवमें बहुत ही बुरी है। जिसने आत्मश्लाघा की, उसने कौनसा पाप नहीं किया ? इसीसे कोई भी बुद्धिमान ऐसा नहीं करता ; परन्तु ऊहरत इस पापको भी करा लेती है। जब किसी तरह कोई काम नहीं होता, कोई और तारीफ करनेवाला नहीं मिलता ; तब मनुष्य, क्षणस्थायी जीवनके लिए, इस निन्द्य-कर्मको भी करता है।

जीवन क्षणभंगुर है।

यह प्राण उसी तरह चञ्चल हैं, जिस तरह कमलके पत्ते पर पानीकी बूँद। यह जीवन बादलकी छाया, बिजलीकी चमक और पानीके बूबूलेकी तरह है। जीवनकी चंचलता पर महात्मा कबीर कहते हैं :—

( ११६ )

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुसकी जात ।

देखत ही क्षिप्र जायगा, ज्यों तारा परभात ॥

“कविरा” पानी होँजका, देखत गया बिलाय ।

ऐसे जियरा जायगा, दिन दश ढीली लाय ॥

मनुष्य पानीके बुलबुलेकी तरह है । जिस तरह पानीका बुलबुला उठता और क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है ; उसी तरह आदमी पैदा होता और क्षण-भरमें ही नष्ट हो जाता है । यह मनुष्य उसी तरह अदृश्य हो जायगा, जिस तरह सवेरेका तारा देखते-देखते गायब हो जाता है ।

कबीरदास कहते हैं, जिस तरह देखते-देखते होँजका पानी, मोरीकी राहसे निकल कर, बिलाय जाता है ; उसी तरह यह जीवात्मा देहसे निकल जायगा ; दस-पाँच दिनको देर समझिये ।

महात्मा शङ्कराचार्य जी ने भी कहा है :—

“नलिनीदलगत जलमतितरलम् ।

तद्रज्जीवनमतिशय चपलम् ॥”

“यह जीवन कमल-पत्र पर पड़े हुए जलकी तरह वञ्छल है ।”

ऐसे वञ्छल जीवनके लिये अज्ञानी मनुष्य नीच-से-नीच कर्म करनेमें संकोच नहीं करता,—यह बड़ी ही लज्जाकी बात

बुदबुदा=बबुला । मानुस=आदमी । परभात=सवेरा । जियरा=जीव ।

( १२० )

है। अगर मनुष्यको हज़ारों-लाखों बरसकी उम्र मिलती अथवा सही काकभुशण्ड होते; तो न जाने मनुष्य क्या-क्या पाप कर्म न करता? बड़े ही नीच हैं, जो इस चन्द्ररोज़ा जिन्दगीके लिए, तरह-तरहके पापोंकी गठरी बाँधकर, अपना लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। मनुष्यो! आँखें खोलकर देखो और कान देकर सुनो! मिट्टी और पत्थर अथवा लकड़ी वगैरः की बनी चीज़ोंकी कुछ उम्र है; पर तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं। अतः इस क्षणस्थायी जीवनमें पाप-कर्म न करो।

कुण्डलिया ।

जैसे पंकजपत्र पर, जल चंचल ढरि जात ।

त्यौही चंचल आगहू, तजि जैहं निज गात ।

तजि जैहं निज गात, बात यह नीके जानत ।

तोहु ढँाडि विवेक, नृपनकी सेवा ढानत ।

निज गुन करत बखान, निलजता उधरी ऐसे ।

भूल गयो सतज्ञान, मूढ अज्ञानी जैसे ॥३६॥

पंकज पत्र = कमलका पत्ता । ढरि जात = ढलक जाता है । त्यौही = उसी तरह । तजि जैहं = छोड़ जायेंगे । निज गात = अपना शरीर । नीके = अच्छी तरह । विवेक = विचार । सेवा ढानत = चाकरी करता है । निज गुन करत बखान = अपने गुण ब्याप गाता है । सतज्ञान = असल ज्ञान, सच्चा ज्ञान ।