वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११६ )
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुसकी जात ।
देखत ही क्षिप्र जायगा, ज्यों तारा परभात ॥
“कविरा” पानी होँजका, देखत गया बिलाय ।
ऐसे जियरा जायगा, दिन दश ढीली लाय ॥
मनुष्य पानीके बुलबुलेकी तरह है । जिस तरह पानीका बुलबुला उठता और क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है ; उसी तरह आदमी पैदा होता और क्षण-भरमें ही नष्ट हो जाता है । यह मनुष्य उसी तरह अदृश्य हो जायगा, जिस तरह सवेरेका तारा देखते-देखते गायब हो जाता है ।
कबीरदास कहते हैं, जिस तरह देखते-देखते होँजका पानी, मोरीकी राहसे निकल कर, बिलाय जाता है ; उसी तरह यह जीवात्मा देहसे निकल जायगा ; दस-पाँच दिनको देर समझिये ।
महात्मा शङ्कराचार्य जी ने भी कहा है :—
“नलिनीदलगत जलमतितरलम् ।
तद्रज्जीवनमतिशय चपलम् ॥”
“यह जीवन कमल-पत्र पर पड़े हुए जलकी तरह वञ्छल है ।”
ऐसे वञ्छल जीवनके लिये अज्ञानी मनुष्य नीच-से-नीच कर्म करनेमें संकोच नहीं करता,—यह बड़ी ही लज्जाकी बात
बुदबुदा=बबुला । मानुस=आदमी । परभात=सवेरा । जियरा=जीव ।