भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

( १२० )

है। अगर मनुष्यको हज़ारों-लाखों बरसकी उम्र मिलती अथवा सही काकभुशण्ड होते; तो न जाने मनुष्य क्या-क्या पाप कर्म न करता? बड़े ही नीच हैं, जो इस चन्द्ररोज़ा जिन्दगीके लिए, तरह-तरहके पापोंकी गठरी बाँधकर, अपना लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। मनुष्यो! आँखें खोलकर देखो और कान देकर सुनो! मिट्टी और पत्थर अथवा लकड़ी वगैरः की बनी चीज़ोंकी कुछ उम्र है; पर तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं। अतः इस क्षणस्थायी जीवनमें पाप-कर्म न करो।

कुण्डलिया ।

जैसे पंकजपत्र पर, जल चंचल ढरि जात ।

त्यौही चंचल आगहू, तजि जैहं निज गात ।

तजि जैहं निज गात, बात यह नीके जानत ।

तोहु ढँाडि विवेक, नृपनकी सेवा ढानत ।

निज गुन करत बखान, निलजता उधरी ऐसे ।

भूल गयो सतज्ञान, मूढ अज्ञानी जैसे ॥३६॥

पंकज पत्र = कमलका पत्ता । ढरि जात = ढलक जाता है । त्यौही = उसी तरह । तजि जैहं = छोड़ जायेंगे । निज गात = अपना शरीर । नीके = अच्छी तरह । विवेक = विचार । सेवा ढानत = चाकरी करता है । निज गुन करत बखान = अपने गुण ब्याप गाता है । सतज्ञान = असल ज्ञान, सच्चा ज्ञान ।