वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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कहने वाला कहता है कि इस जीवनके लिए, जो नितान्त क्षणभंगुर है, जिसकी स्थिरता कुछ भी नहीं है, मैंने कोई उपाय—कोई उद्यम उठा न रक्खा। और तो और ; इस शुद्ध जीवनके लिए, अपनी तारीफ आप करनेका महापातक भी मैंने किया ; और वह भी ऐसे लोगोंके सामने, जो धनके मद से मतवाले हो रहे थे और जो किसी की ओर आँख उठाकर भी न देखते थे। हाय ! ये सब अकर्म करने पर भी मेरा मनोरथ सिद्ध न हुआ !
संसारमें अपने गुणोंका आप बखान करना—बड़ा भारी पाप समझा जाता है। आत्मश्लाघा या आत्मप्रशंसा वास्तवमें बहुत ही बुरी है। जिसने आत्मश्लाघा की, उसने कौनसा पाप नहीं किया ? इसीसे कोई भी बुद्धिमान ऐसा नहीं करता ; परन्तु ऊहरत इस पापको भी करा लेती है। जब किसी तरह कोई काम नहीं होता, कोई और तारीफ करनेवाला नहीं मिलता ; तब मनुष्य, क्षणस्थायी जीवनके लिए, इस निन्द्य-कर्मको भी करता है।
जीवन क्षणभंगुर है।
यह प्राण उसी तरह चञ्चल हैं, जिस तरह कमलके पत्ते पर पानीकी बूँद। यह जीवन बादलकी छाया, बिजलीकी चमक और पानीके बूबूलेकी तरह है। जीवनकी चंचलता पर महात्मा कबीर कहते हैं :—