वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ११८ )
कहने वाला कहता है कि इस जीवनके लिए, जो नितान्त क्षणभंगुर है, जिसकी स्थिरता कुछ भी नहीं है, मैंने कोई उपाय—कोई उद्यम उठा न रक्खा। और तो और ; इस शुद्ध जीवनके लिए, अपनी तारीफ आप करनेका महापातक भी मैंने किया ; और वह भी ऐसे लोगोंके सामने, जो धनके मद से मतवाले हो रहे थे और जो किसी की ओर आँख उठाकर भी न देखते थे। हाय ! ये सब अकर्म करने पर भी मेरा मनोरथ सिद्ध न हुआ !
संसारमें अपने गुणोंका आप बखान करना—बड़ा भारी पाप समझा जाता है। आत्मश्लाघा या आत्मप्रशंसा वास्तवमें बहुत ही बुरी है। जिसने आत्मश्लाघा की, उसने कौनसा पाप नहीं किया ? इसीसे कोई भी बुद्धिमान ऐसा नहीं करता ; परन्तु ऊहरत इस पापको भी करा लेती है। जब किसी तरह कोई काम नहीं होता, कोई और तारीफ करनेवाला नहीं मिलता ; तब मनुष्य, क्षणस्थायी जीवनके लिए, इस निन्द्य-कर्मको भी करता है।
जीवन क्षणभंगुर है।
यह प्राण उसी तरह चञ्चल हैं, जिस तरह कमलके पत्ते पर पानीकी बूँद। यह जीवन बादलकी छाया, बिजलीकी चमक और पानीके बूबूलेकी तरह है। जीवनकी चंचलता पर महात्मा कबीर कहते हैं :—
( ११६ )
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुसकी जात ।
देखत ही क्षिप्र जायगा, ज्यों तारा परभात ॥
“कविरा” पानी होँजका, देखत गया बिलाय ।
ऐसे जियरा जायगा, दिन दश ढीली लाय ॥
मनुष्य पानीके बुलबुलेकी तरह है । जिस तरह पानीका बुलबुला उठता और क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है ; उसी तरह आदमी पैदा होता और क्षण-भरमें ही नष्ट हो जाता है । यह मनुष्य उसी तरह अदृश्य हो जायगा, जिस तरह सवेरेका तारा देखते-देखते गायब हो जाता है ।
कबीरदास कहते हैं, जिस तरह देखते-देखते होँजका पानी, मोरीकी राहसे निकल कर, बिलाय जाता है ; उसी तरह यह जीवात्मा देहसे निकल जायगा ; दस-पाँच दिनको देर समझिये ।
महात्मा शङ्कराचार्य जी ने भी कहा है :—
“नलिनीदलगत जलमतितरलम् ।
तद्रज्जीवनमतिशय चपलम् ॥”
“यह जीवन कमल-पत्र पर पड़े हुए जलकी तरह वञ्छल है ।”
ऐसे वञ्छल जीवनके लिये अज्ञानी मनुष्य नीच-से-नीच कर्म करनेमें संकोच नहीं करता,—यह बड़ी ही लज्जाकी बात
बुदबुदा=बबुला । मानुस=आदमी । परभात=सवेरा । जियरा=जीव ।
( १२० )
है। अगर मनुष्यको हज़ारों-लाखों बरसकी उम्र मिलती अथवा सही काकभुशण्ड होते; तो न जाने मनुष्य क्या-क्या पाप कर्म न करता? बड़े ही नीच हैं, जो इस चन्द्ररोज़ा जिन्दगीके लिए, तरह-तरहके पापोंकी गठरी बाँधकर, अपना लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। मनुष्यो! आँखें खोलकर देखो और कान देकर सुनो! मिट्टी और पत्थर अथवा लकड़ी वगैरः की बनी चीज़ोंकी कुछ उम्र है; पर तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं। अतः इस क्षणस्थायी जीवनमें पाप-कर्म न करो।
कुण्डलिया ।
जैसे पंकजपत्र पर, जल चंचल ढरि जात ।
त्यौही चंचल आगहू, तजि जैहं निज गात ।
तजि जैहं निज गात, बात यह नीके जानत ।
तोहु ढँाडि विवेक, नृपनकी सेवा ढानत ।
निज गुन करत बखान, निलजता उधरी ऐसे ।
भूल गयो सतज्ञान, मूढ अज्ञानी जैसे ॥३६॥
पंकज पत्र = कमलका पत्ता । ढरि जात = ढलक जाता है । त्यौही = उसी तरह । तजि जैहं = छोड़ जायेंगे । निज गात = अपना शरीर । नीके = अच्छी तरह । विवेक = विचार । सेवा ढानत = चाकरी करता है । निज गुन करत बखान = अपने गुण ब्याप गाता है । सतज्ञान = असल ज्ञान, सच्चा ज्ञान ।
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वैराग्य शतक
हे भाई ! कैम कष्ट की बात है ! पहले यहाँ कैसा राजा राज करता था, उसकी राजसभा कैसी थी, उसके यहाँ कैसे- कैसे शूर सामन्त और सेना एवं चन्द्रानना स्त्रियों थीं, पर आज सब सूना है ! सबको काल खा गया !! पृ० ११५
( १२१ )
36, For the sake of prolonging our life-breath which is as restless as the drops of water lying on a lotus-leaf, what measures were left undone by us even discarding all discrimination between right and wrong ? So much so that we had to indulge in the sin of shameless self-praise in the presence of wealthy men whose mind is filled with extreme vanity and unscrupulousness.
आतः कष्टमहो महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च
तत्पारवं तस्य च साऽपि राजपरिषत्ताश्रन्दविभ्राननाः ॥
उद्गितः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः
सर्वं यस्य वशादगात्समुत्पिण्डं कालाय तस्मै नमः ॥ ३७
ऐ भाई ! कैसे कष्ट की बात है ! पहले यहाँ कैसा राजा राज करता था, उसकी सेना कैसी थी, उसके राजपुत्रोंका समूह कैसा था, उसकी राजसभा कैसी थी, उसके यहाँ कैसी-कैसी चन्द्रनानां स्त्रियाँ थीं, कैसे अच्छे-अच्छे चारण-भाट और कहानी कहनेवाले उसके यहाँ थे ! वे सब जिस कालके वश हो गये, उसी कालको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३७ ॥
कोई शङ्खस किसी प्रतापी राजाकी राजनगरीको ऊजड़ देख कर शोक करता और कहता है कि, यहाँ का राजा बड़ा जुबर्दस्त था । उसके पास अनगिन्ती सेना थी, उसके पास अच्छे-अच्छे शूर-सामन्त थे, उसके बड़े-बड़े शूरवीर राजपुत्र थे, उसके यहाँ चन्द्रमा को भी लजानेवाली स्त्रियाँ थीं, उसकी राजसभा इन्द्रकी सभाको भी मात करती थी, उसकी सभामें
( १२२ )
एक-से-एक बुद्धिमान मन्त्री, चारण, भाट और विदूषक प्रभृति थे। एक दिन ये सब थे ; पर आज न वह राजा है, न राजनगरी है, न राजसभा है, न वह चतुरङ्गिणी सेना है, न वे गुरुसामन्त हैं और न वे विधुवदनी मोहिनी स्त्रियाँ ही हैं ! वे सब कहाँ गये ? उन सब को काल खागया ! आज उनका नाम-निशान भी संसारमें नहीं है ! ओह ! जो काल ऐसा बली है, जिसने उन सब को स्वप्नवत् कर दिया, मैं उस बली काल को ही नमस्कार करता हूँ । महात्मा कबीरदास कहते हैं :—
सातों शब्दज बाजते, घर घर-होते राग । ते मन्दिर खाली परे, बैठन लागे काग ॥ परदा रहती पद्मिनी, करती कुलकी कान । बड़ी जु पहुँची कालकी, डेरा हुआ मैदान ॥
जन मकानोंमें पहले तरह-तरहके बाजे बजते और गाने गाये जाते थे, वे आज खाली पड़े हैं। अब उन पर कन्वे बैठते हैं।
जो पद्मिनी पहले परदेमें रहती थी और कुलकी कान के मारे बाहर न निकलती थी, उसीका आज काल के आने से मैदानमें डेरा हो गया है ; यानी सबके सामने मरघट में पड़ी है।
निश्चय ही संसार अनित्य और नाशमान् है। इस जगत्की
( १२३ )
कोई भी चीज़ सदा न रहेगी। एक दिन अपनी-अपनी बारी आने से सभीका नाश होगा। इसी विषयमें महाकवि दांग कहते हैं—
है ज्वाल आमदा अज्जा, आफ़रीनशके तमाम ।
महर गर्दू है, चिरागे रहगुजारे बाद यैं।।
संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, सभी नाशमान् हैं। जिसे सूर्य कहते हैं, वह भी एक ऐसा चिराग—दीपक है, जो हवा के सामने रक्खा हुआ है और “अब बुझा-अब-बुझा” हो रहा है; तब औरोंकी तो बात ही क्या? इस संसारकी यही दशा है।
ये अनन्त जल-राशिपूर्ण महासागर और सुमेरु तथा हिमालय प्रभृति पर्वत भी एक दिन कालके कराल-गालमें समा जायेंगे। देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, जल और पवन इन सबको भीकाल खा जायगा। यम, कुबेर, वरुण और इन्द्रादिक महातेजस्वी देव भी एक दिन गिर पड़ेंगे। स्थिर ध्रुव भी अस्थिर हो जायगा। अमृतमय चन्द्रमा और महाप्रकाशमान सूर्य ये दोनों भी नष्ट हो जायेंगे। जगत्के अधिष्ठाता ईश्वर, परमेश्वी ब्रह्मा और महाभैरव-रूप इन्द्रका भी अभाव हो जायगा; तब संसारके साधारण प्राणियोंकी कौन गिन्ती है? एक दिन इस जगत्का ही अस्तित्व नहीं रहेगा, तब और किस की आस्था की जाय? यह जगत् ही भ्रममात्र है। इसमें अज्ञानी
( १२४ )
को ही आस्था होती है। वही भोगों को सुख-रूप समझ कर उनकी तृष्णा करता और अपने तर्ज बन्धन में फँसाता है। ज्ञानी पुरुष इस संसारको मिथ्या और सार-हीन तथा नाश-मान समझता है। वह तो केवल ब्रह्मको नित्य और अविनाशी समझ कर उसमें मग्न रहता है।
दोहा ।
नृपति सैन जम्मति सचिव, सुत कलव परिवार ।
करत सबन को स्वम-सम, नमो काल करतार ॥३७॥
37. How painful, alas ! O brother, is the fate of that great king, who was surrounded on all sides by his dependent chieftains who had such a brilliant court, such handsome women, such a host of haughty princes and such bards and story-tellers ! Let us bow before the all-powerful Time through whose influence all those have now passed into oblivion.
वयं येभ्यो जाताश्रिरपरिगता एव खलुते
समं चैः संदृद्धाः स्मृतिविषयतां तेषपि गमिताः ॥
इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासत्रपतना-
द्वतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतश्चभिः ॥३८॥
नृपति=राजा। सचिव=मंत्री। सुत=बेटा। कलव=छी। स्वम-सर=छपनेके समान। नमो=नमस्कार करता हूँ। काल-करतार=विद्याता-काल।
( १२५ )
जिनसे हमने जन्म लिया था, उन्हें इस दुनियासे गये बहुत दिन हो गये ; जिनके साथ हम बड़े हुए थे, वे भी इस दुनियाको छोड़कर चले गये । अब हमारी दशा भी रेतीले नदी-किनारेके बूँदोंकी सी हो रही है, जो दिन-दिन जड़ छोड़ते हुए गिराऊ होते चले जाते हैं ॥२८॥
जिनसे हम पैदा हुए थे, उन्हें इस दुनियासे गये जमाना गुजर गया और जिन लोगोंके साथ हम जन्मे थे अथवा जो लोग हमारे समवयस्क थे, वे भी चल बसे ; जिन लोगोंके साथ हम पले, जिनके साथ हम खेले-कूदे, जिनके साथ हमने कारोबार किया, वे सब भी कालके गालमें समा गये । अब हमारा नम्बर भी आया ही समझिये—अब हम भी चलने ही वाले हैं । दिन-दिन हमारा शरीर क्षीण हुआ जाता है । हमारी दशा अब नदी-तटके बालूमें लगे हुए वृक्षों कीसी है, जिनके गिरने की संभावना हर घड़ी रहती है । हमारी पेसी हालत है, फिर भी आश्चर्य है, कि हमारा माया-मोह नहीं छूटता ! अब भी हमारा मन नहीं समझता और वह संसारी जजालोंसे अलग होना नहीं चाहता ! महात्मा कबीर भी यही कहते हैं । उनकी सुन लीजिये :—
बारी बारी आपनी, चले पियारे मित ।
तेरी बारी जीवरा, नियरे आवे नित ॥
( ३२६ )
माली आवत देखिकै, कलियाँ करी पुकार ।
फूली-फूली जुनि लई, कलह हमारी बार ॥
साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार ।
कागदमें बाकी रही, तारों लागी बार ॥
बारी-बारीसे सभी प्यारे और मित्र चल बसे । अरे जीव ! अब तेरा नम्बर भी नित्य निकट आता-जाता है । मालीको आते देख कर, कलियोंने कहा—फूली-फूली तो आज चुन ली गई, कलह हमारी भी बारी है । हमारे साथी कले रथे अब हम भी चलने वाले हैं । कागजमें यानी खातेमें कुछ साँस बाकी रह गये हैं, इससे देर हो रही है ; यानी अपने श्रेष्ठ साँसों को पूरा करनेके लिए हम उहरे हुए हैं ।
संसारका यही हाल है, रोज ही यह तमाशा देखते हैं ; पर फिर भी हमें होश नहीं होता !
छप्पय ।
जो जन्मे हम संग, उतौ सब स्वर्ग सिधारे ।
जो खेले हम संग, काल तिनहुँ कहँ मारे ।
मिंत=मित्र । जीवरा=हे जीव ! नियरे=नजदीक । नित= नित्य, रोज । बार=बारी । चालनहार=चलने वाले, भरने वाले । बार=देर ॥
उतौ=वे तो । तिनहुँ कह=उनको भी । दीसत=दीखता है ।
( १२७ )
हमहूँ जरजर देह ; निकट ही दीसत मरिबो !
जैसे सरिता-तीर-वृक्ष को, तुच्छ उखरिबो ।
अजहूँ नहिँ छाँड़त मोह मन, उमग-उमग उरभो रहत ।
ऐसे अचेतके संग सों, न्याय जगत को दुख सहत । ३८॥
38. Those with whom we were born have long ere this passed away from this world. Those with whom we grew up have also shared the similar fate. Our condition now is like that of the trees growing on a sandy river-bank which are gradually crumbling away from day to day.
यज्ञानेके कचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यैको
यज्ञाप्येकस्तदुख बहवस्तल चान्ते न चैकः ॥
इत्थं चेभ्यो रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाचौ
कालः काल्या सह बहुकलः कीडति प्राणिशरैः ॥३६॥
जिस घरमें पहले अनेक लोग थे, उसमें अब एक ही रह गया है । जिस घरमें एक था, उसमें अनेक हो गये, पर अन्तमें एक भी न रहा । इससे मालूम होता है, कि काल देवता, अपनी पत्नी कालीके साथ, संसार-रूपी चौपड़में, दिन-रात-रूपी पासोंको लुढ़का-लुढ़का कर और इस जगत्के प्राणियोंकी गोटी बना-बना कर, खेले रहा है ॥३६॥
मरिबो=मरना ; मरैत । सरिता=नदी । तीर=किनारा । अजहूँ=अब तक । उरभो=फस ।
( १२८ )
जिस घरमें पहले पुत्र, पौत्र, पुत्र-बधू, पौत्र-बधू, पुत्री, दो-हिते और दोहिती प्रभृति अनेक लोग थे, आज वह सुतासा हो गया है, उसमें आज एक ही आदमी नज़र आता है। जिस घरमें पहले एक आदमी था, उसका कुटुम्ब इतना बढ़ा कि सैकड़ों हो गये; पर आज देखते हैं, उसमें एक भी नहीं है। घर का ताला लगा है, भीतर लम्बी-लम्बी घास उग आई है, दीवारें गिर रही हैं, छतें चू रही हैं और ईंटे दाँत दिखा रही हैं। अब उस घरमें चमगीदड़, उलू, साँप और बिच्छू प्रभृति रहते हैं। महात्मा कबीर कहते हैं—
दोहा
ऊँचा महल चिनाइया, सुवरन कली बुलाय । ते मन्दिर खाली परे, रहे मसाना जाय ॥ मलमल खासा पहरते, खाते नागर पान । टेढ़े होकर चालते, करते बहुत गुमान । महलन माँही पौढ़ते, परिसल अंग लगाय । ते सुपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥
जिनहोने ऊँचे-उच्चे महल चिनवाये थे और उनमें सुनहरी काम कराये थे, वे आज श्रमशालनमें चले गये हैं और उनके
घरनकली=घनहरी कली-चना। बुलाय=मँगा कर। ते=वे। मन्दिर=महल। मसाना=श्रमशालन। गुमान=घमण्ड। पौढ़ते=सोते। परिसल=कुष। दीसे=दीखे।
( १२६ )
बनवाये हुए महल सूने पड़े हैं। जो मलमल और खासा पहनते थे, नागर-पान खाते थे, अकड़-अकड़ कर टेढ़े-टेढ़े बलते थे, अभिमानके नशेमें चूर हुए जाते थे और बदनेमें इत्र, फुलेल और सेण्ट प्रभृति लगाकर महलोंमें साते थे, वे स्वप्नमें भी नहीं दीखते। देखते-देखते न जाने कहाँ गायब हो गये !
छप्पय ।
बहुत रहत जिहि धाम, तहाँ एकहिको राखत ।
एक रहत जिहि ठौर, तहाँ बहुतहि अभिलाषत ।
फेर एकहू नाहि, करी तहाँ राज दुराजी ।
कालीके संग काल, रची चौपड़की वाजी ।
दिनरात उभय पास लिखे, इहि विधिसें क्रीड़ा करत ।
सत्र वाशी सोबत सार ज्यों, मिलत चलत बिछुरत मरत ॥३६॥
39. In homes where there were many members before, there is only a single one left now i. e., out of innumerable members only one is survived. In families, which consisted of a single person at first but had multiplied afterwards, not a soul has been left in the end. Thus the changeable god of Time is playing at dice with his wife Kali, the goddess of destruction, using Day and Night as a pair of dice for casting and laying poor mortals at stake on each turn.
जिहि=जिस। धाम=घर। तहाँ=उसमें। ठौर=जगह। उभय= दोनों। क्रीड़ा करत=खेलते हैं।
६
( १३० )
तपस्यन्तः सन्तः किमपिनिवसायः सुरनदी
गुणोदारान्दाराजुत परिचयामः सविनयम् ॥
पिबामः शास्त्रौषाडुतविविधकाभ्यामृतरसा-
त्र विघ्नः किं कुर्मः कतिपयनिषेधायुधि जने ॥४०॥
हमारी समझमें नहीं आता, कि हम इस अरूप जीवन—इस छोटीसी जिन्दगीमें क्या-क्या करें अर्थात् हम गंगा-तट पर बस कर तप करें अथवा गुणवती स्त्रियोंकी प्रेम-सहित यथायोग्य सेवा करें अथवा वेदान्त शास्त्रका अमृत पिये या काव्यरस पाने करें ॥४१॥
कहने वाला कहता है और ठीक ही कहता है—यह जीवन क्षणभरका है। इस चन्द्रशेखा जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? काम तो अनेक है, पर समय थोड़ा है। गंगातट पर जाकर शिव-शिव की रट लगाना भी अच्छा है; गुणवती सुन्दरियों के साथ मीठी-मीठी बातें बोलना, उनके सङ्ग रहना और उनके साथ रमण करना भी भला है। वेदान्त शास्त्रके मर्म को समझना और उसका अमृत-रस पीना या काव्य-रस पीना भी अच्छा है। अच्छे सब हैं और सभी करने योग्य हैं; पर हमारी समझमें नहीं आता, कि एक क्षणभरकी जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? मतलब यह है, कि मनुष्य-जीवन बहुत ही थोड़ा है। इसलिये मनुष्यको, जब तक दम रहै, सब तज कर
( १३१ )
एकमात्र परमात्माका भजन करना चाहिये। कबीरदास कहते हैं—
यह तन काँचा कुम्भ है, माँहि किया रहवास । “कबिरा” नैन निहारिया, नहीं पलककी आस ॥ “कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नाही काल । चेत सके तो चेतिये, मीच परी है ख्याल ॥ “कबिरा” सुपने रैनके, उधरि आये नैन । जीव परा बहु लूटमें, जागूँ तो लेन न देन ॥ आजकाल कि पाँच दिन, जंगल होयगा बास । ऊपर-ऊपर हल फिरै, ढोर चरगे घास ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—
“तुलसी” जगमें आइके, कर लीजे दो काम । देवको टुकड़ा भलों, लेवेको हरि-नाम ॥ “तुलसी” राम-सनेह कर, त्यागु सकल उपचार । जैसे घटत न अंक नौ, नौ के लिखत पहार ॥
तन=शरीर । काँचा कुम्भ=कच्चा घड़ा । माँहि किया रहवास=भीतर जीव रहता है । नैन निहारिया=आँखोंसे देखा । मीच=मौत । छपने रनके=रातके छपने । उधरि आये=खुल गये । आजकाल कि पाँच दिन=आज, कल अथवा पाँच दिन बाद । ढोर=गाय भैंस प्रभृति मवेशी ।
टुकड़ा=रोटोका टुकड़ा । रामसनेह कह=रामसे प्रेम कर । त्यागु सकल उपचार=सारे आंकट छोड़ । घटत न अंक नौ=नौका अंक नहीं घटता—
( १३२ )
जग ते रहूँ छत्तीस हवैं, राम-वरन छत्तीन ।
“तुलसी” देखु विचारि हिय, है यह मतो प्रवीन ॥
यह मनुष्य-शरीर मिट्टीके कच्चे घड़ेके जसा है। इसीके अन्दर जीवात्मा रहता है। कबीरदासजी कहते हैं, आँखोंसे देखा है, एक क्षणकी भी आशा नहीं। खुलासा यह कि, जिस शरीरमें जीवात्मा रहता है, वह कच्चे घड़ेके समान क्षणभङ्गुर है। जिस तरह कच्चे घड़ेको फूटते देर नहीं; उसी तरह इस कच्चे घड़े-जैसे शरीरको नाश होते देर नहीं। कौन जाने किस क्षण यह शरीर-रूपी कच्चा घड़ा फूट जाय और इसमेंसे जीवात्मा निकल जाय ? इसकी आशा उतनी देरकी भी नहीं, जितनी देर कि पलकके भपनेमें लगती है !
कबीरदास कहते हैं, जो दिन आज है, वह कल न होगा। जीव ! चेत सके तो चेत ! मौत सिरपर सवार है।
जो अज्ञानी बरसोंका प्रबन्ध करते हैं, बरसों जीने की आशा करते हैं, वे इस बचनसे शिक्षा ग्रहण करें। कबीर-दास बरसों छोड़—दो चार दिन भी जीवन रहनेकी आशा नहीं करते। वे कहते हैं, आज हो, कल रहो या न रहो। आज तुम हँस-खेल रहे हो, आज तुम्हारा शरीर आरोग्य है, आश्चर्य्य नहीं, कल तुम बीमार होकर मरण-शय्यापर पड़े हो
बना रहता है। नौके लिखत पहार—नौका पहाड़ों लिखनेसे। जगते रहूँ छत्तीस हवैं—जगत्को पीठ दो, संसारको त्याग दो। रामवरन छत्तीन=राम के चरणोंके सम्मुख ई और ३ की तरह रहो—रामसे प्रेम करो।
( १२३ )
अथवा मर ही जाओ । इस्लिये चेत करो, होश संभालो और आगेकी सफ़रका बन्दोबस्त करो । अगर सँसारके जज़ालमें फ़से हुए, जीवनकी लम्बी आशा रक्खे हुए, शीघ्र ही, आज ही, अभी, इसी क्षणसे अगली यात्राका प्रबन्ध न करोगे ; वहाँ मिलनेके लिये—यहाँके ईश्वरीय बैंक द्वारा—रुपये-पैसे, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, महल-मकान और बाग-बगीचोंका बन्दोबस्त न करोगे—इस दुनियामें पराया दुःख दूर न करोगे और मालिकका नाम न जपोगे ; तो तुम्हें उस लम्बी सफ़रमें बड़ी-बड़ी तकलीफ़ोंका सामना करना पड़ेगा । यहाँ बोओगे, तो वहाँ काटोगे । यहाँ अच्छा करोगे, तो वहाँ अच्छा पाओगे । यहाँ गरीब और मुहताजोंको दोगे, तो वहाँ आपको मिलेगा ।
कबीरदास कहते हैं, यह जीवन सुपनेके समान है । रातको सुपनेमें देखा कि जीव लूटमें पड़ा है, तरह-तरहके ऐश-आराम कर रहा है, सुख-भोग भोग रहा है ; लेकिन ज्योंही आँख खुली तो क्या देखता हूँ, कि कुछ भी नहीं है । जिस तरह सुपनेमें आदमी दिलको फरहत देनेवाले बाग-बगीचोंकी सैर करता है, माशूकाके गलेमें हाथ डाले घूमता है, उससे सम्भोग करता है ; अथवा राजा हो जाता है, हक़मत करता है, चन्द्रबदनियों का नाच-गान देखता है और मन-ही-मन बड़ा खुश होता है ; पर ज्यों ही आँख खुलती है, तो न बाग-बगीचे दीखते हैं और न माशूका और राज-पाट । बस, ठीक यही हाल जाग्रत अवस्थाका है । जिस तरह रातके सुपनेको मिथ्या समझते
( १३४ )
हो, उसी तरह दिनेके दृश्योंको भी मिथ्या समझो। वह सुपना सोई हुई-हालतमें दीखता है और यह जागते हुए। देखते हैं, आज एक आदमी राजा है, हज़ारों तरहके भोग भोग रहा है; पर कल ही वह राहका भिखारी बन जाता है। आज किसीके घरमें सुन्दरी पतिव्रता नारी है, आत्माकारी पुत्र-पौत्र है, सुशीला पुत्रबहुएँ और कन्यायें हैं, सैकड़ों दास-दासी हैं, द्वापर हाथी झूमता है, मोटर हर समय दरवाज़ेपर खड़ी रहती है; चन्द रोज बाद देखते हैं, कि वही आदमी गुदड़ी ओढ़े हुए सड़कपर भीख माँग रहा है। पूछते हैं, क्योंजी तुम्हारा यह क्या हाल? तुम्हारे कुटुम्बी और धन-दौलतका क्या हुआ? जवाब देता है—भाई! प्लेगमें सारे घरके लोग मर गये। कोई पानी देने और नाम लेनेवाला भी न रहा। धन-दौलतमेंसे कुछको चोर और शेषको डाकू डाका डालकर ले गये। जब खानेका भी ठिकाना न रहा, तब प्राणरक्षार्थ भीख माँगना आरम्भ किया है। कहिये, ऐसे जीवन और सुख-भोगोंको सुपनेकी माया न कहें तो क्या कहें?
अभी कलकी बात है, हमारी एक आँखोंकी पुतलीके समान प्यारी पुत्री हमें छोड़कर चली गयी। वह ऐसी रूपवती थी, कि हम उसे देखकर कहा करते थे,—विधाताने खूब फुसलतमें गड़ी है। उसके देखनेसे हमारी शोकसन्तप्त आत्माको शान्ति मिलती थी। चोर शोकमें गुराँ होनेपर भी उसे देखकर हम खिल पड़ते थे। हमारे दिनभरके रंजोगम काफ़र हो जाते
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थे। उसके दशनोंसे हमारे हृदयमें सुख होता था, इसीसे हम उसे 'दिलाराम' भी कहा करते थे। नाम उसका दिलाराम नहीं—सूर्यकांता था। जब हम घरमें बैठे हुए पूछ देखा करते थे, वह भोली सूरत घुटुअन चलकर हमारे पास आजाती। कभी हमारी दावात उठट देती, कभी कूलम उठा लेती और कभी प्रूफके कागज़ोंको मुँहमें देने लगती। जब हम आनन्दमें मश हो जाते, कूलम पटककर उसे उठा लेते। उसको चूमते, प्यार करते और हृदयको शीतल करते थे। आज तीन दिनसे वह नहीं है। कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा जान पड़ता है, गोया हमने उसे सुपनेमें देखा था। सुपनेमें ही वह हमारे पास आयी थी। सुपनेमें ही अपने बचपनके खेलोंसे उसने हमें खुश किया था और सुपनेमें ही हमने उसे प्यार-दुलार किया था। पाठक ! आपही विचारिये। क्या यह सब सुपना नहीं था ? क्या अब जो हमारे प्यारे हमारे साथ हैं, हमारे सामने फिरते-डोलते और काम-धन्धा करते हैं, उनको भी हम सुपनेकी आया न समझे ? उस डेढ़ सालकी बच्चीकी तरह ही, हम भी एक दिन सबको छोड़कर यमसदनके राही न होंगे ? हमारे पीछे जो रह जायेंगे, उन्हें हम सुपनेमें मिले हुएके समान न दीखेंगे ? यद्यपि हमने अभीतक घर-गृहस्थी नहीं त्यागी है। अभी हम संसारी जंजालोंमें पँसे हुए हैं, तोभी हम अपने प्यारे-से-प्यारके बरनेपर भी आँखोंसे आँसु नहीं डालते। बहुत लोग हमारे इस हालको देखकर अचम्भा करते हैं। कोई कुछ और कोई