भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १३१ )

एकमात्र परमात्माका भजन करना चाहिये। कबीरदास कहते हैं—

यह तन काँचा कुम्भ है, माँहि किया रहवास । “कबिरा” नैन निहारिया, नहीं पलककी आस ॥ “कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नाही काल । चेत सके तो चेतिये, मीच परी है ख्याल ॥ “कबिरा” सुपने रैनके, उधरि आये नैन । जीव परा बहु लूटमें, जागूँ तो लेन न देन ॥ आजकाल कि पाँच दिन, जंगल होयगा बास । ऊपर-ऊपर हल फिरै, ढोर चरगे घास ॥

तुलसीदासजी कहते हैं—

“तुलसी” जगमें आइके, कर लीजे दो काम । देवको टुकड़ा भलों, लेवेको हरि-नाम ॥ “तुलसी” राम-सनेह कर, त्यागु सकल उपचार । जैसे घटत न अंक नौ, नौ के लिखत पहार ॥

तन=शरीर । काँचा कुम्भ=कच्चा घड़ा । माँहि किया रहवास=भीतर जीव रहता है । नैन निहारिया=आँखोंसे देखा । मीच=मौत । छपने रनके=रातके छपने । उधरि आये=खुल गये । आजकाल कि पाँच दिन=आज, कल अथवा पाँच दिन बाद । ढोर=गाय भैंस प्रभृति मवेशी ।

टुकड़ा=रोटोका टुकड़ा । रामसनेह कह=रामसे प्रेम कर । त्यागु सकल उपचार=सारे आंकट छोड़ । घटत न अंक नौ=नौका अंक नहीं घटता—

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