भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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तपस्यन्तः सन्तः किमपिनिवसायः सुरनदी

गुणोदारान्दाराजुत परिचयामः सविनयम् ॥

पिबामः शास्त्रौषाडुतविविधकाभ्यामृतरसा-

त्र विघ्नः किं कुर्मः कतिपयनिषेधायुधि जने ॥४०॥

हमारी समझमें नहीं आता, कि हम इस अरूप जीवन—इस छोटीसी जिन्दगीमें क्या-क्या करें अर्थात् हम गंगा-तट पर बस कर तप करें अथवा गुणवती स्त्रियोंकी प्रेम-सहित यथायोग्य सेवा करें अथवा वेदान्त शास्त्रका अमृत पिये या काव्यरस पाने करें ॥४१॥

कहने वाला कहता है और ठीक ही कहता है—यह जीवन क्षणभरका है। इस चन्द्रशेखा जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? काम तो अनेक है, पर समय थोड़ा है। गंगातट पर जाकर शिव-शिव की रट लगाना भी अच्छा है; गुणवती सुन्दरियों के साथ मीठी-मीठी बातें बोलना, उनके सङ्ग रहना और उनके साथ रमण करना भी भला है। वेदान्त शास्त्रके मर्म को समझना और उसका अमृत-रस पीना या काव्य-रस पीना भी अच्छा है। अच्छे सब हैं और सभी करने योग्य हैं; पर हमारी समझमें नहीं आता, कि एक क्षणभरकी जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? मतलब यह है, कि मनुष्य-जीवन बहुत ही थोड़ा है। इसलिये मनुष्यको, जब तक दम रहै, सब तज कर