वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३२ )
जग ते रहूँ छत्तीस हवैं, राम-वरन छत्तीन ।
“तुलसी” देखु विचारि हिय, है यह मतो प्रवीन ॥
यह मनुष्य-शरीर मिट्टीके कच्चे घड़ेके जसा है। इसीके अन्दर जीवात्मा रहता है। कबीरदासजी कहते हैं, आँखोंसे देखा है, एक क्षणकी भी आशा नहीं। खुलासा यह कि, जिस शरीरमें जीवात्मा रहता है, वह कच्चे घड़ेके समान क्षणभङ्गुर है। जिस तरह कच्चे घड़ेको फूटते देर नहीं; उसी तरह इस कच्चे घड़े-जैसे शरीरको नाश होते देर नहीं। कौन जाने किस क्षण यह शरीर-रूपी कच्चा घड़ा फूट जाय और इसमेंसे जीवात्मा निकल जाय ? इसकी आशा उतनी देरकी भी नहीं, जितनी देर कि पलकके भपनेमें लगती है !
कबीरदास कहते हैं, जो दिन आज है, वह कल न होगा। जीव ! चेत सके तो चेत ! मौत सिरपर सवार है।
जो अज्ञानी बरसोंका प्रबन्ध करते हैं, बरसों जीने की आशा करते हैं, वे इस बचनसे शिक्षा ग्रहण करें। कबीर-दास बरसों छोड़—दो चार दिन भी जीवन रहनेकी आशा नहीं करते। वे कहते हैं, आज हो, कल रहो या न रहो। आज तुम हँस-खेल रहे हो, आज तुम्हारा शरीर आरोग्य है, आश्चर्य्य नहीं, कल तुम बीमार होकर मरण-शय्यापर पड़े हो
बना रहता है। नौके लिखत पहार—नौका पहाड़ों लिखनेसे। जगते रहूँ छत्तीस हवैं—जगत्को पीठ दो, संसारको त्याग दो। रामवरन छत्तीन=राम के चरणोंके सम्मुख ई और ३ की तरह रहो—रामसे प्रेम करो।