भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १२३ )

अथवा मर ही जाओ । इस्लिये चेत करो, होश संभालो और आगेकी सफ़रका बन्दोबस्त करो । अगर सँसारके जज़ालमें फ़से हुए, जीवनकी लम्बी आशा रक्खे हुए, शीघ्र ही, आज ही, अभी, इसी क्षणसे अगली यात्राका प्रबन्ध न करोगे ; वहाँ मिलनेके लिये—यहाँके ईश्वरीय बैंक द्वारा—रुपये-पैसे, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, महल-मकान और बाग-बगीचोंका बन्दोबस्त न करोगे—इस दुनियामें पराया दुःख दूर न करोगे और मालिकका नाम न जपोगे ; तो तुम्हें उस लम्बी सफ़रमें बड़ी-बड़ी तकलीफ़ोंका सामना करना पड़ेगा । यहाँ बोओगे, तो वहाँ काटोगे । यहाँ अच्छा करोगे, तो वहाँ अच्छा पाओगे । यहाँ गरीब और मुहताजोंको दोगे, तो वहाँ आपको मिलेगा ।

कबीरदास कहते हैं, यह जीवन सुपनेके समान है । रातको सुपनेमें देखा कि जीव लूटमें पड़ा है, तरह-तरहके ऐश-आराम कर रहा है, सुख-भोग भोग रहा है ; लेकिन ज्योंही आँख खुली तो क्या देखता हूँ, कि कुछ भी नहीं है । जिस तरह सुपनेमें आदमी दिलको फरहत देनेवाले बाग-बगीचोंकी सैर करता है, माशूकाके गलेमें हाथ डाले घूमता है, उससे सम्भोग करता है ; अथवा राजा हो जाता है, हक़मत करता है, चन्द्रबदनियों का नाच-गान देखता है और मन-ही-मन बड़ा खुश होता है ; पर ज्यों ही आँख खुलती है, तो न बाग-बगीचे दीखते हैं और न माशूका और राज-पाट । बस, ठीक यही हाल जाग्रत अवस्थाका है । जिस तरह रातके सुपनेको मिथ्या समझते