वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अथवा मर ही जाओ । इस्लिये चेत करो, होश संभालो और आगेकी सफ़रका बन्दोबस्त करो । अगर सँसारके जज़ालमें फ़से हुए, जीवनकी लम्बी आशा रक्खे हुए, शीघ्र ही, आज ही, अभी, इसी क्षणसे अगली यात्राका प्रबन्ध न करोगे ; वहाँ मिलनेके लिये—यहाँके ईश्वरीय बैंक द्वारा—रुपये-पैसे, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, महल-मकान और बाग-बगीचोंका बन्दोबस्त न करोगे—इस दुनियामें पराया दुःख दूर न करोगे और मालिकका नाम न जपोगे ; तो तुम्हें उस लम्बी सफ़रमें बड़ी-बड़ी तकलीफ़ोंका सामना करना पड़ेगा । यहाँ बोओगे, तो वहाँ काटोगे । यहाँ अच्छा करोगे, तो वहाँ अच्छा पाओगे । यहाँ गरीब और मुहताजोंको दोगे, तो वहाँ आपको मिलेगा ।
कबीरदास कहते हैं, यह जीवन सुपनेके समान है । रातको सुपनेमें देखा कि जीव लूटमें पड़ा है, तरह-तरहके ऐश-आराम कर रहा है, सुख-भोग भोग रहा है ; लेकिन ज्योंही आँख खुली तो क्या देखता हूँ, कि कुछ भी नहीं है । जिस तरह सुपनेमें आदमी दिलको फरहत देनेवाले बाग-बगीचोंकी सैर करता है, माशूकाके गलेमें हाथ डाले घूमता है, उससे सम्भोग करता है ; अथवा राजा हो जाता है, हक़मत करता है, चन्द्रबदनियों का नाच-गान देखता है और मन-ही-मन बड़ा खुश होता है ; पर ज्यों ही आँख खुलती है, तो न बाग-बगीचे दीखते हैं और न माशूका और राज-पाट । बस, ठीक यही हाल जाग्रत अवस्थाका है । जिस तरह रातके सुपनेको मिथ्या समझते
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हो, उसी तरह दिनेके दृश्योंको भी मिथ्या समझो। वह सुपना सोई हुई-हालतमें दीखता है और यह जागते हुए। देखते हैं, आज एक आदमी राजा है, हज़ारों तरहके भोग भोग रहा है; पर कल ही वह राहका भिखारी बन जाता है। आज किसीके घरमें सुन्दरी पतिव्रता नारी है, आत्माकारी पुत्र-पौत्र है, सुशीला पुत्रबहुएँ और कन्यायें हैं, सैकड़ों दास-दासी हैं, द्वापर हाथी झूमता है, मोटर हर समय दरवाज़ेपर खड़ी रहती है; चन्द रोज बाद देखते हैं, कि वही आदमी गुदड़ी ओढ़े हुए सड़कपर भीख माँग रहा है। पूछते हैं, क्योंजी तुम्हारा यह क्या हाल? तुम्हारे कुटुम्बी और धन-दौलतका क्या हुआ? जवाब देता है—भाई! प्लेगमें सारे घरके लोग मर गये। कोई पानी देने और नाम लेनेवाला भी न रहा। धन-दौलतमेंसे कुछको चोर और शेषको डाकू डाका डालकर ले गये। जब खानेका भी ठिकाना न रहा, तब प्राणरक्षार्थ भीख माँगना आरम्भ किया है। कहिये, ऐसे जीवन और सुख-भोगोंको सुपनेकी माया न कहें तो क्या कहें?
अभी कलकी बात है, हमारी एक आँखोंकी पुतलीके समान प्यारी पुत्री हमें छोड़कर चली गयी। वह ऐसी रूपवती थी, कि हम उसे देखकर कहा करते थे,—विधाताने खूब फुसलतमें गड़ी है। उसके देखनेसे हमारी शोकसन्तप्त आत्माको शान्ति मिलती थी। चोर शोकमें गुराँ होनेपर भी उसे देखकर हम खिल पड़ते थे। हमारे दिनभरके रंजोगम काफ़र हो जाते
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थे। उसके दशनोंसे हमारे हृदयमें सुख होता था, इसीसे हम उसे 'दिलाराम' भी कहा करते थे। नाम उसका दिलाराम नहीं—सूर्यकांता था। जब हम घरमें बैठे हुए पूछ देखा करते थे, वह भोली सूरत घुटुअन चलकर हमारे पास आजाती। कभी हमारी दावात उठट देती, कभी कूलम उठा लेती और कभी प्रूफके कागज़ोंको मुँहमें देने लगती। जब हम आनन्दमें मश हो जाते, कूलम पटककर उसे उठा लेते। उसको चूमते, प्यार करते और हृदयको शीतल करते थे। आज तीन दिनसे वह नहीं है। कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा जान पड़ता है, गोया हमने उसे सुपनेमें देखा था। सुपनेमें ही वह हमारे पास आयी थी। सुपनेमें ही अपने बचपनके खेलोंसे उसने हमें खुश किया था और सुपनेमें ही हमने उसे प्यार-दुलार किया था। पाठक ! आपही विचारिये। क्या यह सब सुपना नहीं था ? क्या अब जो हमारे प्यारे हमारे साथ हैं, हमारे सामने फिरते-डोलते और काम-धन्धा करते हैं, उनको भी हम सुपनेकी आया न समझे ? उस डेढ़ सालकी बच्चीकी तरह ही, हम भी एक दिन सबको छोड़कर यमसदनके राही न होंगे ? हमारे पीछे जो रह जायेंगे, उन्हें हम सुपनेमें मिले हुएके समान न दीखेंगे ? यद्यपि हमने अभीतक घर-गृहस्थी नहीं त्यागी है। अभी हम संसारी जंजालोंमें पँसे हुए हैं, तोभी हम अपने प्यारे-से-प्यारके बरनेपर भी आँखोंसे आँसु नहीं डालते। बहुत लोग हमारे इस हालको देखकर अचम्भा करते हैं। कोई कुछ और कोई
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कुछ कहता है। पर हमारे न रोने-कूकनेका कारण यह है कि, हमने इस संसारमें घिसे-घिसे बहुतसे दुःख देखे हैं। हम कई प्राण-प्यारोंकी वियोगाश्रितमें जले हैं। इसीसे अब हम समझ गये हैं कि, यह सब सुपना है। एक दिन न एक दिन हम भी सबको छोड़कर चल देंगे अथवा और सब जो हमारी आँखोंके सामने मौजूद हैं—हमारे देखते-देखते, सुपनेमें देखे हुआओंकी तरह, गायब हो जायेंगे।
कबीरदास कहते हैं,—अरे भाई! आज अथवा कल अथवा पाँच दिन बाद तुम्हारा बसेरा जंगलमें होगा। तुम्हारे ऊपर हल चलेंगे अथवा तुम्हारे ऊपर उगी हुई घासको गाय भैंस आदि पशु चरेंगे। खुलासा यह है, कि तुम कदाचित आज ही मर जाओ; अगर आज बच गये तो कल खेर नहीं। अगर साँस पूरे न हुए होंगे—वित्रयुतके खातेमें तुम्हारे कुछ साँस बाकी होंगे, तो उनके पूरे होनेपर पाँच या दस दिन बाद तुम अवश्य मरोगे। तुम इस शरीरमें सदा न रहोगे। तुम्हारे देह छोड़ते ही, लोग तुमसे घुणा करेंगे। खास तुम्हारी हृदयेश्वरी ही तुम्हारी सूरत देखकर डरेगी। तुम्हारे बदनपर अगर एक चाँदीका छल्ला भी होगा, तो उसे उतार लेगी। लोग तुम्हें लेजाकर जला या गाड़ आवेंगे। जिस जगह तुम जलाये या दफनाये जाओगे—जहाँ तुम्हारे शरीरकी खाक पड़ी होगी, उसी जगह किसान हल चलावेंगे। यदि तुम्हारी मिट्टीपर घास उग आयेगी, तो दोर चौपे उसे चरेंगे। अतः होशियार हो जाओ ! गफ़लतकी
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नींद त्यागो और अपनी अवश्यभावी यात्राका प्रबन्ध करो, जिससे राहमें तुम्हें किसी वस्तुका अभाव और किसी तरहकी तकलीफ न हो।
इस दुनियामें काम बहुत हैं और उग्रका यह हाल है कि, पलक मारने भरका भरौसा नहीं। इस क्षण-भरकी ज़िन्दगीमें कौनसा काम करना चाहिये, जिससे आगेकी यात्रामें सुख-हो-सुख मिले?—यही सवाल ऊपर उठाया गया है। इस सवालको ईश्वर तक पहुँचे हुए, ईश्वरके सच्चे और प्रथम श्रेणीके भक्तवर गोस्वामि तुलसीदास जीने बहुत ही खूबसूरतीसे हल कर दिया है। उन्होंने मनुष्यके लिए दो ही काम चुन दिये हैं—“देवोको दुकड़ा भला और लेवेको हरनाम।” उनकी इन दो बातोंपर जो अमल करेंगे, निश्चय ही उनको सुख-ही-सुख है। उन्हें नरकोंकी भीषण यन्त्रणायें न सहनी होंगी। वे स्वर्गमें नाना प्रकारके सुख भोगेंगे और अमृतपान करेंगे, कल्पतरु उनकी इच्छाओंको पूरी करेगा। अगर वे पराया भला करके, दुखियाओंके दुःख दूर करके, बदला या मुआविज़ा पानेकी इच्छा न करेंगे; निष्काम कर्म करेंगे और कृष्णके प्रेममें गूँक हो जायेंगे, उसके सिवा किसी भी संसारी पदार्थको न चाहेंगे; तो उन्हें वह चीज़ मिलेगी, जो हज़ारों-लाखों स्वर्गोंसे भी बढ़-चढ़कर होगी; फिर उन्हें कभी दुःखका नाम भी न सुनना पड़ेगा। यही बात महात्मा तुलसीदासजीने अपने दोहोंमें कही है; उन्हें खाली पढ़िये हो नहीं, उनपर गौर भी कीजिये। बिचारनेसे
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उनकी बातें आपके दुःख और क्लेश नाश करने वाली अल्पर्थ महौषधियाँ जान पड़गी। अगर आप उनकी बताई हुई दवा पीयेंगे, तो आप अजर अमर हो जायेंगे।
तुलसीदासजी कहते हैं :—संसार में आकर दो काम कर लो :—(१) भूखों को भोजन दो, और (२) भगवान् का नाम लो।
तुलसीदासजी कहते हैं :—कर्म, ज्ञान और उपासना प्रभुति उपचारोंको त्याग कर भगवान्की भक्ति करो, क्योंकि भक्तिये विषयी लोगोंको भी मुक्ति मिल सकती है; किन्तु कर्म, ज्ञान और उपासना आदिसे नहीं। जैसे ६ का पहाड़ा लिखनेसे ६ का अङ्क नहीं मटता, वैसे ही कर्म ज्ञान आदि से वासना नहीं मिटती और जब तक वासना बनी रहती है तब तक मुक्ति हो नहीं सकती। वासना ही तो जन्म-मरणकी जड़ है, वासनासे ही जन्म लेना पड़ता है; वासना मिटी और मुक्ति हुई; पर विषयी लोगोंकी वासना नहीं मिटती। जिस तरह नौका पहाड़ा लिखनेसे नौ का अङ्क बना ही रहता है; उसी तरह उनके कर्म-ज्ञान और उपासनादि उपचार करने पर भी वासना बनी ही रहती है। नौका पहाड़ा लिखने पर नौ का अङ्क कैसे बना रहता है, नीचे देखिये :—
१ = ६
१८ = ६
२७ = ६
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| ३६ | ३ + ६ = ९ |
|---|---|
| ४५ | ४ + ५ = ९ |
| ५४ | ५ + ४ = ९ |
| ६३ | ६ + ३ = ९ |
| ७२ | ७ + २ = ९ |
| ८१ | ८ + १ = ९ |
| ९० | ९ + ० = ९ |
इस दहेिका अर्थ हमने साधारणतया समझा दिया है। अगर हम और भी खुलासा समझावें, तो ३४ पैरों खर्च होंगे। मतलब यह, मुक्ति-लाभ करनेके लिये “भक्ति” सीधा और सरल उपाय है। नारद, वाल्मीकि और शबरी प्रभृति भक्तिके प्रभाव से ही ऊंचे चढ़े हैं—कर्म, ज्ञान और उपासनादिसे नहीं।
जगत् से ३६ की तरह और भगवान्के चरणोंमें—छः तीन या तिरसठकी तरह रहो। तुलसीदासजी कहते हैं, मनमें विचार कर देख लो, यह मता अत्युत्तम है।
६ जगत् है और ३ मनुष्य है। ३६ के अङ्कमें ३ ने ६ को पीठ दे रखी है। बस, इसी तरह तुम जगत्को पीठ दे कर रहो; यानो संसारकी ओर मत देखो, संसारमें ममता मत रखो। दूसरी ओर भगवान्के पक्षमें ६३ को तरह रहो। इसमें ६ भगवान् की शरण है और ३ मनुष्य है। जिस तरह ३ का अङ्क ६ को ओर टकटकी लगाये देख रहा है; उसी तरह मनुष्यको हरदम जुगदीशाकी शरणमें टकटकी लगाये हुए रहना चाहिए।
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दोहा ।
तप तीरथ तरुणी-रमण, विद्या बहुत यशंग ।
कहा-कहा मन रुचि करै, पायौ तन क्लशभंग ॥४०॥
40. Should we sojourn by the banks of the heavenly river Ganges practising penances, or should we enjoy the company of women possessing the high qualities of beauty etc, always addressing them in a befitting manner, or should we drink in the ambrosial essence of the religious books or literary treatises ? We are quite at a loss to know which course we should have recourse to in so short a life,
गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य
ब्रह्मव्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य ॥
किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्वल ते निर्विशंकाः
संप्राप्त्यन्ते जरठहरिणाः शुभकंङ्कविनोदम् ॥४१॥
अहा ! वे सुखके दिन कब आवेंगे, जब हम गंगा-किनारे, हिमालयकी शिलाओं पर, पद्मासन लगाकर, विधान-अनुसार शौख मँद कर, ब्रह्मका ध्यान करते हुए, योग-निद्रामें मग्न होंगे और बूढ़े-बूढ़े हिरन निर्भय हो, हमारे शरीरकी रगड़से, अपने शरीरकी खुजली मिटाते होंगे ? ॥४१॥
तप = तपस्या । तीरथ = तीर्थ, पवित्र धाम । तरुणी-रमण = युवतियों
हरामयशोक ६६
ये सुख के दिन कब आयेंगे, जब हम ( इन योगीराज की तरह ) गंगातट पर पद्मासन लगा, योगनिद्रा में मग्न होंगे और सूँह-सूँहें हिरन हमारे शरीर की रगद से अपने खुशली मिटाते होंगे ?
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( १४१ )
संसारी माया-जालमें सुख नहीं है। संसारमें जो सुखी दीखते हैं, वे भी वास्तवमें दुखी हैं। उनका सुख दिखावटी सुख है, सच्चा सुख नहीं। हम उन्हें गाड़ी और मोटरोंमें चढ़ते देख, बढ़िया-बढ़िया महलोंमें आनन्द करते देख, उनके यहाँ द्रव्यकी बहुलता देख, सुखी समझते हैं; पर वास्तवमें वे सुखी नहीं हैं। असल बात यह है कि संसारमें सुख है ही नहीं। सुख केवल संसार-त्याग या "वैराग्य" में है। इसीलिये कहनेवाला कहता है, वे दिन कब आवेंगे, जब हम गङ्गा-किनारे, हिमालयकी शिलापर बैठ, पद्मासन लगाकर, ब्रह्मके ध्यान में लीन होंगे? उस ध्यानमें जब हमारी सुख-बुध जाती रहेगी, उस समय बूढ़े हिरन हमें जीता-जागता मनुष्य न समझ, कोई निर्जीव पदार्थ समझ, निःशङ्क होकर, हमारे शरीरसे अपना शरीर रगड़-रगड़कर, अपने शरीरकी खुजली मिटायेंगे। जिन पुरुषोंको यह सुख प्राप्त है, वही सच्चे सुखिया हैं—उन्हींका जीवन धन्य है!
प्रेमिकके प्रेममें तन्मय हो जानेमें ही मञ्जु है। जब पूरी-तरहसे ध्यान लग जाता है, तब शरीर पर पक्षी बैठे या जानवर, खुजली मिटावे या चाहे जो करें, कोई ख़बर नहीं रहती। ऐसे ध्यानियोंको ही सिद्धि मिलती है। महाकवि दाग कहते हैं:—
को भोगना। रचि करें = चाहता है। तन=शरीर। क्षणभंग=पलमें नाश होने वाला।
( १४२ )
कमाल इश्क है ऐ दाग़, महव हो जाना ।
मुके ख़बर नहीं, नफ़ा क्या ज़रूर कैसा ? ॥
प्रेममें जो लोग तन्मय हो जाते हैं, उन्हींका प्रेम—प्रेम है । विना तन्मयताके प्रेम थोथा है । मैं तन्मय हूँ, इसलिये मुझे घाटे लाभकी फ़िक्र तो क्या, ख़बर ही नहीं ।
कबीर कहते हैं—
प्रेम-प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
घाठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
लौ लागी जब जानिये, झूटि न कबहुँ जाय ।
जीवन लौ लागी रहे, सूझा भौहि समय ।
कबीर साहब कहते हैं,—प्रेम-प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेमको कोई नहीं जानता । जिसमें आठ पहर डूबा रहे, वही प्रेम है । लौ लगी तभी समझो, जबकि लौ झूट न जाय । जिन्दगी-भर लौ लगी रहे और मरने पर प्यारमें समा जाय ।
चित्तका स्वभाव है, कि वह अगली-पिछली बातोंको याद करता है । इन्द्रियों का स्वभाव है कि, वे अपने-अपने विषयों की ओर झुकती हैं । कान आवाज़ सुनना चाहता है । नेत्र नई वस्तु देखना चाहते हैं ; पर इस तरह ईश्वर-उपासना
— इश्क=प्रेम । महव हो जाना=तन्मय हो जाना ; गर्क हो जाना । नफ़ा=लाभ । ज़रूर=हानि ; मुकसान ।
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करनेसे कोई लाभ नहीं। तथा अशूल्य समय नष्ट करना है। ईश्वर-उपासना करने वालेको, सबसे पहले, अपने चित्त और इन्द्रियोंको, उनके कामोंसे हटा कर, अपने अधीन कर लेना चाहिये। बिना चित्तके एक तरफ हुए और बिना इन्द्रियोंको उनके कामोंसे रोके—ध्यान लंग ही नहीं सकता। ध्यान करने वाला न शरीरको हिलावे और न किसी तरफ देखे। अगर किसी तरफ भयानक शब्द हो या कोई जीव काटे, तोभी ध्यानीका ध्यान न टूटना चाहिये। आजकल अधिकांश कर्मकाण्डी गोमुखीमें हाथ चलाते जाते हैं और मनमें अनेक गढ़न्त गढ़ते जाते हैं। कोई कुछ कहता है, तो उसकी भी सुन लेते हैं। ऐसी ईश्वरउपासनासे क्या लाभ?
एक गोपीका कृष्णमें आदर्श प्रेम।
—○—○—○—
एक बार एक गोपी यशोदाके घर दीपक जलाने आई। वहाँ दृष्ण खेल रहे थे। वह दृष्णके प्रेममें ऐसी पगी कि, उसने वतीके बजाय अपनी उँगली दीपक पर लगा दी। यहाँ तक कि सारी उ गली जल गई, पर उसे खबर न हुई; किसी दूसरेने उसे चेत कराया तो चेत हुआ।
एक नमाज़ी मियँाको एक कुलटाका उपदेश।
—○—○—○—
इसी तरह, एक मियँा जी भी ज्ञानमाज़ बिछा कर नमाज़
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पढ़ने लगे । उधरसे एक व्यभिचारिणी ली अपने यारके प्रेममें डूबी हुई उत्तसे मिलने चली । वह प्रेममें ऐसा डूबी हुई थी कि, वह मियांजी की ज्ञानमात्र पर होकर निकल गई । मियांजी को क्रोध आ गया ; आपने उसे दो चार गालियाँ सुनाईं । खीने कहा—“लानत है आपके ईश्वर-प्रेम पर, जो आपने मुझे देख लिया ! प्रेम तो मेरा जैसा होना चाहिये, जो मुझे अपने यार के प्रेममें न आप दीखे और न आपकी ज्ञानमात्र ही ।”
सच है, दिखाऊ प्रेमसे कोई लाभ नहीं ; प्रेम हो तो ऐसा हो, कि अष्ट पहर चॉसठ घड़ी अपने प्रेमीका ही ध्यान रहे और उसमें मनुष्य ऐसा डूबा रहे कि, तनोबदन की भी सुध न रहे । वैसे प्रेमसे ही जगदीश मिलते हैं ।
दोहा ।
ब्रह्म्यान धर गंगतट, वैठूंगो तज संग ।
कबधौँ वह दिन होयगो, हिरन खुजावत अंग ? ॥४१॥
41. When are those happy days to come when I shall be sitting in the padma posture on a rock of the Himalaya mountain, absorbed in meditation of Brahma in strict compliance with the principles of Yuga, when the oldest deer of the forest will make themselves happy by scratching my body with the tips of their horn fearlessly.
तज अंग = ली पुत्र प्रभृति का साथ छोड़ कर ।
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स्फुरत्स्फारज्योत्स्वाधवलिततले कापि पुलिने
सुखासीनाः शान्तश्चनिष्ठु दधुसरितः ॥
भवाभोगोद्दिनाः शिवशिवशिवेत्यातर्चनसः
कदा स्यामानन्दोद्वमबहुलबाष्पाकुलदशः ॥४२॥
वह समय कब आवेगा, जब हम पवित्र गंगाके ऐसे स्थान पर जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे चमक रहा होगा सुखसे बैठे होंगे और रातके समय, जब सब तरहका शोरगुल बन्द होगा, आनन्दश्चु-भूषा-नेत्रोंसे, संसारके विषय-दुःखोंसे थक कर, सर्वशक्तिमान् शिवकी रटना लगा रहे होंगे ? ॥४२॥
अन्य हैं वे लोग जिन्हें संसारी झूठे विषय-सुखोंसे नफ़रत हो गई है, जो यहाँके जज़ालोंसे थक गये हैं, जिन्होंने मोह-जाल तोड़कर गङ्गा के पवित्र किनारे पर वास कर लिया है और निस्तब्ध चाँदनी रातमें, गङ्गादु होकर, शिव-शिव रटते हैं !! और लोग जो संसार के मोहपाशमें फँसे हुए हैं, अपना जीवन बुरा खोते हैं।
दोहा ।
ज्योत्स्ना सौ सित थल तहाँ, सुदित च्छौसुत नैन ।
कब रटिहैं तट गंगके, शिव-शिव धारत चैन ॥४२॥
ज्योत्स्ना = चन्द्रमाकी चाँदनी। सौ = से। सित = सफेद। थल =
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42. When is the time to come when, sitting peacefully on a lonely spot by the side of the holy Ganges where the surface of the ground has been made luminous by the spreading, shining moon-light and the nights are free from all sorts of disquieting sounds, we shall shed tears of joy from eyes filled with them spontaneously, our minds tired of the pleasures of life and our speech deep in humble prayer to the Almighty Shiva,
महादेवो देवः सरिदपि च सैषा सुरसरि-
दुग्धा एवागारं वसनमपि ता एव हरितः ॥
सुद्धा कालोज्यं व्रतमिदमैन्यव्रतमिदं
कियद्वा कस्यामो वटविष्ट एवासु दधिता ॥४३॥
महादेव ही हमारा एक देव हो, जाहन्वी ही हमारी नदी हो, एक गुफा ही हमारा घर हो, दिशा ही हमारे वस्त्र हों, समय ही हमारा मित्र हो, किसीके सामने दीन न होना ही हमारा मित्र हो, अधिक क्या कहें वटवृक्ष ही हमारी अर्द्धांगिनी हो ॥ ४३ ॥
जो हज़ारों-लाखों देवताओं को छोड़कर एक परमात्मा को ही अपना देव समझता है, रात-दिन उसीके ध्यानमें मग्न रहता है; जो गङ्गा तट पर बसता है, गङ्गामें स्नान करता है, गङ्गाजल ही पीता है; जो कपड़ोंकी भी ज़रूरत नहीं रखता, दिशाओंको ही अपने वस्त्र समझता है; कालको ही अपना
स्थान। तर्ह=वहाँ। सुदित=प्रसन्न। आँखयुत=आँखओसे भरे हुए। वन=नेत्र। तट=किनारा। श्वारत=गद्गद। वन=वाणी।
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मित्र मानता है ; किसीके साधने दीनता नहीं करता, किसी से कुछ नहीं माँगता ; वटवृक्षके आश्रयमें रहकर भगवान् का भजन करता और वटवृक्षको ही अपने दुःख-सुखको संगिनी प्राणवल्लभा समझता है, वही पुरुष धन्य है ! उसका ही जगत् में आना सफल है । परमात्माकी दया या पूर्वजन्मके पुण्योंसे ही ऐसी बुद्धि होती है । ऐसी बुद्धिके प्रभावसे ही वह दुःखोंसे छूटकर नित्यानन्दमें मग्न रहता है ।
दोहा ।
देव ईश सुरसरि सरित, दिशा वसन गिरि गेह ।
सुहत्काल वट कामिनी, वत अदैन्य सुख एह ॥४३॥
43. Let the Great God be the only god for us, the heavenly angels the only river, a cave the only house, the direction of the open space the only clothing, time the only friend and the vow of non-supplication the only vow. What more should he say than that a banyan tree in the forest may be our only better half ?
शिरः शार्दे स्वर्गीत्यशुपतिशिरस्तः चित्तिधरं
महीभ्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम् ॥
देव=देवता । ईश=महादेव । सुरसरि=देवनदी=गंगा । दिशा=दशों दिशाएँ । वसन=कपड़ा । गिरि=पहाड़ । गेह=घर । दिशा वसन=दिशाओंको ही कपड़े मान कर नङ्गा रहना । सहद=मित्र । काल=सूर्य । वट=बड़का पेड़ । कामिनी=स्त्री । अदैन्य=न माँगना ; हाथ न पसारना ।
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अथो गंगा सेयं पदमुपगता स्तोत्रमथवा विवेकअष्टांशं भवति विनिपातः शतमुखः ॥४४
देखिये, गंगा स्वर्गसे शिवजीके मस्तक पर गिरी ; उनके सिर से हिमालय पर्वत पर ; हिमालय पर्वतसे पृथ्वीपर ; और पृथ्वीसे समुद्रमें गिरी । इससे मालूम होता है, कि विवेक-हीनोंका पद-पद पर सैकड़ों प्रकारसे पतन होता है ॥४४॥
जो विचारपूर्वक काम नहीं करते, जो अकलसे काम नहीं लेते, उनको तरह-तरहसे नीचा देखना पड़ता है । कविने यहाँ गङ्गाका दृष्टान्त दिया है और खूब दिया है ।
शिक्षा—जो विवेक-हीन हैं, जो अहङ्कारी हैं, वे सदा नीचा देखते और बार-बार नीचे गिरते हैं ; अतः मनुष्यको भूलकर भी घमण्ड न करना चाहिये और खूब विचार कर काम करना चाहिये । गंगाको बड़ा घमण्ड हुआ, तब उसका गर्व खर्च करनेके लिए ब्रह्माने उसे अपने कमण्डलमें भर लिया । गंगाका मस्तक नीचा हो गया । फिर भी ; उसने घमण्ड न छोड़ा, तब शिव जीने उसे अपनी जटाओंमें रोक लिया । फिर महाराजा अगीरथने बार तप किया, तो शिवजीने उसे छोड़ा । शिवके सिरसे वह हिमालय पर गिरी और वहाँ से बहती-बहती समन्दरमें जा गिरी । जो गर्व करते हैं, जगदीश उनके दुर्गमव हो जाते हैं । जगदीश उन्हीं को मिलते हैं, जो गवसे दूर भागते और विवेकभुष्ट नहीं होते ।
श्लेष सादी ने कहा है—
हकैं बेहूदा गर्दन अफ़राज़द । लेखतन रा बगर्दन श्रन्दाज़द ॥
वैराग्य शनक
A black and white illustration of a multi-armed deity, likely Shiva, standing on a rocky cliff overlooking a river and a winding path. The deity has several arms, some holding objects, and is surrounded by a misty landscape.
देखिये, गंगा स्वर्ग से शिवजी के मस्तक पर गिरती, उनके सिर से हिमालय पर्वत पर, हिमालय से पृथिवी पर, पृथिवी से समुद्र में गिरती। इससे मालूम होता है, कि विवेक-भ्रष्टों का पद-पद पर सैकड़ों प्रकार से पतन होता है।
नेत्रभयशतक ३-६-६
शुद्धविषय योगभक्तिर ही एतः मन्त्रकर आकाशतन्त्री के शार त्या सकलै र् ।