वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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थे। उसके दशनोंसे हमारे हृदयमें सुख होता था, इसीसे हम उसे 'दिलाराम' भी कहा करते थे। नाम उसका दिलाराम नहीं—सूर्यकांता था। जब हम घरमें बैठे हुए पूछ देखा करते थे, वह भोली सूरत घुटुअन चलकर हमारे पास आजाती। कभी हमारी दावात उठट देती, कभी कूलम उठा लेती और कभी प्रूफके कागज़ोंको मुँहमें देने लगती। जब हम आनन्दमें मश हो जाते, कूलम पटककर उसे उठा लेते। उसको चूमते, प्यार करते और हृदयको शीतल करते थे। आज तीन दिनसे वह नहीं है। कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा जान पड़ता है, गोया हमने उसे सुपनेमें देखा था। सुपनेमें ही वह हमारे पास आयी थी। सुपनेमें ही अपने बचपनके खेलोंसे उसने हमें खुश किया था और सुपनेमें ही हमने उसे प्यार-दुलार किया था। पाठक ! आपही विचारिये। क्या यह सब सुपना नहीं था ? क्या अब जो हमारे प्यारे हमारे साथ हैं, हमारे सामने फिरते-डोलते और काम-धन्धा करते हैं, उनको भी हम सुपनेकी आया न समझे ? उस डेढ़ सालकी बच्चीकी तरह ही, हम भी एक दिन सबको छोड़कर यमसदनके राही न होंगे ? हमारे पीछे जो रह जायेंगे, उन्हें हम सुपनेमें मिले हुएके समान न दीखेंगे ? यद्यपि हमने अभीतक घर-गृहस्थी नहीं त्यागी है। अभी हम संसारी जंजालोंमें पँसे हुए हैं, तोभी हम अपने प्यारे-से-प्यारके बरनेपर भी आँखोंसे आँसु नहीं डालते। बहुत लोग हमारे इस हालको देखकर अचम्भा करते हैं। कोई कुछ और कोई