भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कुछ कहता है। पर हमारे न रोने-कूकनेका कारण यह है कि, हमने इस संसारमें घिसे-घिसे बहुतसे दुःख देखे हैं। हम कई प्राण-प्यारोंकी वियोगाश्रितमें जले हैं। इसीसे अब हम समझ गये हैं कि, यह सब सुपना है। एक दिन न एक दिन हम भी सबको छोड़कर चल देंगे अथवा और सब जो हमारी आँखोंके सामने मौजूद हैं—हमारे देखते-देखते, सुपनेमें देखे हुआओंकी तरह, गायब हो जायेंगे।

कबीरदास कहते हैं,—अरे भाई! आज अथवा कल अथवा पाँच दिन बाद तुम्हारा बसेरा जंगलमें होगा। तुम्हारे ऊपर हल चलेंगे अथवा तुम्हारे ऊपर उगी हुई घासको गाय भैंस आदि पशु चरेंगे। खुलासा यह है, कि तुम कदाचित आज ही मर जाओ; अगर आज बच गये तो कल खेर नहीं। अगर साँस पूरे न हुए होंगे—वित्रयुतके खातेमें तुम्हारे कुछ साँस बाकी होंगे, तो उनके पूरे होनेपर पाँच या दस दिन बाद तुम अवश्य मरोगे। तुम इस शरीरमें सदा न रहोगे। तुम्हारे देह छोड़ते ही, लोग तुमसे घुणा करेंगे। खास तुम्हारी हृदयेश्वरी ही तुम्हारी सूरत देखकर डरेगी। तुम्हारे बदनपर अगर एक चाँदीका छल्ला भी होगा, तो उसे उतार लेगी। लोग तुम्हें लेजाकर जला या गाड़ आवेंगे। जिस जगह तुम जलाये या दफनाये जाओगे—जहाँ तुम्हारे शरीरकी खाक पड़ी होगी, उसी जगह किसान हल चलावेंगे। यदि तुम्हारी मिट्टीपर घास उग आयेगी, तो दोर चौपे उसे चरेंगे। अतः होशियार हो जाओ ! गफ़लतकी