भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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नींद त्यागो और अपनी अवश्यभावी यात्राका प्रबन्ध करो, जिससे राहमें तुम्हें किसी वस्तुका अभाव और किसी तरहकी तकलीफ न हो।

इस दुनियामें काम बहुत हैं और उग्रका यह हाल है कि, पलक मारने भरका भरौसा नहीं। इस क्षण-भरकी ज़िन्दगीमें कौनसा काम करना चाहिये, जिससे आगेकी यात्रामें सुख-हो-सुख मिले?—यही सवाल ऊपर उठाया गया है। इस सवालको ईश्वर तक पहुँचे हुए, ईश्वरके सच्चे और प्रथम श्रेणीके भक्तवर गोस्वामि तुलसीदास जीने बहुत ही खूबसूरतीसे हल कर दिया है। उन्होंने मनुष्यके लिए दो ही काम चुन दिये हैं—“देवोको दुकड़ा भला और लेवेको हरनाम।” उनकी इन दो बातोंपर जो अमल करेंगे, निश्चय ही उनको सुख-ही-सुख है। उन्हें नरकोंकी भीषण यन्त्रणायें न सहनी होंगी। वे स्वर्गमें नाना प्रकारके सुख भोगेंगे और अमृतपान करेंगे, कल्पतरु उनकी इच्छाओंको पूरी करेगा। अगर वे पराया भला करके, दुखियाओंके दुःख दूर करके, बदला या मुआविज़ा पानेकी इच्छा न करेंगे; निष्काम कर्म करेंगे और कृष्णके प्रेममें गूँक हो जायेंगे, उसके सिवा किसी भी संसारी पदार्थको न चाहेंगे; तो उन्हें वह चीज़ मिलेगी, जो हज़ारों-लाखों स्वर्गोंसे भी बढ़-चढ़कर होगी; फिर उन्हें कभी दुःखका नाम भी न सुनना पड़ेगा। यही बात महात्मा तुलसीदासजीने अपने दोहोंमें कही है; उन्हें खाली पढ़िये हो नहीं, उनपर गौर भी कीजिये। बिचारनेसे

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