भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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उनकी बातें आपके दुःख और क्लेश नाश करने वाली अल्पर्थ महौषधियाँ जान पड़गी। अगर आप उनकी बताई हुई दवा पीयेंगे, तो आप अजर अमर हो जायेंगे।

तुलसीदासजी कहते हैं :—संसार में आकर दो काम कर लो :—(१) भूखों को भोजन दो, और (२) भगवान् का नाम लो।

तुलसीदासजी कहते हैं :—कर्म, ज्ञान और उपासना प्रभुति उपचारोंको त्याग कर भगवान्की भक्ति करो, क्योंकि भक्तिये विषयी लोगोंको भी मुक्ति मिल सकती है; किन्तु कर्म, ज्ञान और उपासना आदिसे नहीं। जैसे ६ का पहाड़ा लिखनेसे ६ का अङ्क नहीं मटता, वैसे ही कर्म ज्ञान आदि से वासना नहीं मिटती और जब तक वासना बनी रहती है तब तक मुक्ति हो नहीं सकती। वासना ही तो जन्म-मरणकी जड़ है, वासनासे ही जन्म लेना पड़ता है; वासना मिटी और मुक्ति हुई; पर विषयी लोगोंकी वासना नहीं मिटती। जिस तरह नौका पहाड़ा लिखनेसे नौ का अङ्क बना ही रहता है; उसी तरह उनके कर्म-ज्ञान और उपासनादि उपचार करने पर भी वासना बनी ही रहती है। नौका पहाड़ा लिखने पर नौ का अङ्क कैसे बना रहता है, नीचे देखिये :—

१ = ६

१८ = ६

२७ = ६

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