वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३६ )
| ३६ | ३ + ६ = ९ |
|---|---|
| ४५ | ४ + ५ = ९ |
| ५४ | ५ + ४ = ९ |
| ६३ | ६ + ३ = ९ |
| ७२ | ७ + २ = ९ |
| ८१ | ८ + १ = ९ |
| ९० | ९ + ० = ९ |
इस दहेिका अर्थ हमने साधारणतया समझा दिया है। अगर हम और भी खुलासा समझावें, तो ३४ पैरों खर्च होंगे। मतलब यह, मुक्ति-लाभ करनेके लिये “भक्ति” सीधा और सरल उपाय है। नारद, वाल्मीकि और शबरी प्रभृति भक्तिके प्रभाव से ही ऊंचे चढ़े हैं—कर्म, ज्ञान और उपासनादिसे नहीं।
जगत् से ३६ की तरह और भगवान्के चरणोंमें—छः तीन या तिरसठकी तरह रहो। तुलसीदासजी कहते हैं, मनमें विचार कर देख लो, यह मता अत्युत्तम है।
६ जगत् है और ३ मनुष्य है। ३६ के अङ्कमें ३ ने ६ को पीठ दे रखी है। बस, इसी तरह तुम जगत्को पीठ दे कर रहो; यानो संसारकी ओर मत देखो, संसारमें ममता मत रखो। दूसरी ओर भगवान्के पक्षमें ६३ को तरह रहो। इसमें ६ भगवान् की शरण है और ३ मनुष्य है। जिस तरह ३ का अङ्क ६ को ओर टकटकी लगाये देख रहा है; उसी तरह मनुष्यको हरदम जुगदीशाकी शरणमें टकटकी लगाये हुए रहना चाहिए।