भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

( १३४ )

हो, उसी तरह दिनेके दृश्योंको भी मिथ्या समझो। वह सुपना सोई हुई-हालतमें दीखता है और यह जागते हुए। देखते हैं, आज एक आदमी राजा है, हज़ारों तरहके भोग भोग रहा है; पर कल ही वह राहका भिखारी बन जाता है। आज किसीके घरमें सुन्दरी पतिव्रता नारी है, आत्माकारी पुत्र-पौत्र है, सुशीला पुत्रबहुएँ और कन्यायें हैं, सैकड़ों दास-दासी हैं, द्वापर हाथी झूमता है, मोटर हर समय दरवाज़ेपर खड़ी रहती है; चन्द रोज बाद देखते हैं, कि वही आदमी गुदड़ी ओढ़े हुए सड़कपर भीख माँग रहा है। पूछते हैं, क्योंजी तुम्हारा यह क्या हाल? तुम्हारे कुटुम्बी और धन-दौलतका क्या हुआ? जवाब देता है—भाई! प्लेगमें सारे घरके लोग मर गये। कोई पानी देने और नाम लेनेवाला भी न रहा। धन-दौलतमेंसे कुछको चोर और शेषको डाकू डाका डालकर ले गये। जब खानेका भी ठिकाना न रहा, तब प्राणरक्षार्थ भीख माँगना आरम्भ किया है। कहिये, ऐसे जीवन और सुख-भोगोंको सुपनेकी माया न कहें तो क्या कहें?

अभी कलकी बात है, हमारी एक आँखोंकी पुतलीके समान प्यारी पुत्री हमें छोड़कर चली गयी। वह ऐसी रूपवती थी, कि हम उसे देखकर कहा करते थे,—विधाताने खूब फुसलतमें गड़ी है। उसके देखनेसे हमारी शोकसन्तप्त आत्माको शान्ति मिलती थी। चोर शोकमें गुराँ होनेपर भी उसे देखकर हम खिल पड़ते थे। हमारे दिनभरके रंजोगम काफ़र हो जाते