भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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स्फुरत्स्फारज्योत्स्वाधवलिततले कापि पुलिने

सुखासीनाः शान्तश्चनिष्ठु दधुसरितः ॥

भवाभोगोद्दिनाः शिवशिवशिवेत्यातर्चनसः

कदा स्यामानन्दोद्वमबहुलबाष्पाकुलदशः ॥४२॥

वह समय कब आवेगा, जब हम पवित्र गंगाके ऐसे स्थान पर जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे चमक रहा होगा सुखसे बैठे होंगे और रातके समय, जब सब तरहका शोरगुल बन्द होगा, आनन्दश्चु-भूषा-नेत्रोंसे, संसारके विषय-दुःखोंसे थक कर, सर्वशक्तिमान् शिवकी रटना लगा रहे होंगे ? ॥४२॥

अन्य हैं वे लोग जिन्हें संसारी झूठे विषय-सुखोंसे नफ़रत हो गई है, जो यहाँके जज़ालोंसे थक गये हैं, जिन्होंने मोह-जाल तोड़कर गङ्गा के पवित्र किनारे पर वास कर लिया है और निस्तब्ध चाँदनी रातमें, गङ्गादु होकर, शिव-शिव रटते हैं !! और लोग जो संसार के मोहपाशमें फँसे हुए हैं, अपना जीवन बुरा खोते हैं।

दोहा ।

ज्योत्स्ना सौ सित थल तहाँ, सुदित च्छौसुत नैन ।

कब रटिहैं तट गंगके, शिव-शिव धारत चैन ॥४२॥

ज्योत्स्ना = चन्द्रमाकी चाँदनी। सौ = से। सित = सफेद। थल =

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