वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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पढ़ने लगे । उधरसे एक व्यभिचारिणी ली अपने यारके प्रेममें डूबी हुई उत्तसे मिलने चली । वह प्रेममें ऐसा डूबी हुई थी कि, वह मियांजी की ज्ञानमात्र पर होकर निकल गई । मियांजी को क्रोध आ गया ; आपने उसे दो चार गालियाँ सुनाईं । खीने कहा—“लानत है आपके ईश्वर-प्रेम पर, जो आपने मुझे देख लिया ! प्रेम तो मेरा जैसा होना चाहिये, जो मुझे अपने यार के प्रेममें न आप दीखे और न आपकी ज्ञानमात्र ही ।”
सच है, दिखाऊ प्रेमसे कोई लाभ नहीं ; प्रेम हो तो ऐसा हो, कि अष्ट पहर चॉसठ घड़ी अपने प्रेमीका ही ध्यान रहे और उसमें मनुष्य ऐसा डूबा रहे कि, तनोबदन की भी सुध न रहे । वैसे प्रेमसे ही जगदीश मिलते हैं ।
दोहा ।
ब्रह्म्यान धर गंगतट, वैठूंगो तज संग ।
कबधौँ वह दिन होयगो, हिरन खुजावत अंग ? ॥४१॥
41. When are those happy days to come when I shall be sitting in the padma posture on a rock of the Himalaya mountain, absorbed in meditation of Brahma in strict compliance with the principles of Yuga, when the oldest deer of the forest will make themselves happy by scratching my body with the tips of their horn fearlessly.
तज अंग = ली पुत्र प्रभृति का साथ छोड़ कर ।