भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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करनेसे कोई लाभ नहीं। तथा अशूल्य समय नष्ट करना है। ईश्वर-उपासना करने वालेको, सबसे पहले, अपने चित्त और इन्द्रियोंको, उनके कामोंसे हटा कर, अपने अधीन कर लेना चाहिये। बिना चित्तके एक तरफ हुए और बिना इन्द्रियोंको उनके कामोंसे रोके—ध्यान लंग ही नहीं सकता। ध्यान करने वाला न शरीरको हिलावे और न किसी तरफ देखे। अगर किसी तरफ भयानक शब्द हो या कोई जीव काटे, तोभी ध्यानीका ध्यान न टूटना चाहिये। आजकल अधिकांश कर्मकाण्डी गोमुखीमें हाथ चलाते जाते हैं और मनमें अनेक गढ़न्त गढ़ते जाते हैं। कोई कुछ कहता है, तो उसकी भी सुन लेते हैं। ऐसी ईश्वरउपासनासे क्या लाभ?

एक गोपीका कृष्णमें आदर्श प्रेम।

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एक बार एक गोपी यशोदाके घर दीपक जलाने आई। वहाँ दृष्ण खेल रहे थे। वह दृष्णके प्रेममें ऐसी पगी कि, उसने वतीके बजाय अपनी उँगली दीपक पर लगा दी। यहाँ तक कि सारी उ गली जल गई, पर उसे खबर न हुई; किसी दूसरेने उसे चेत कराया तो चेत हुआ।

एक नमाज़ी मियँाको एक कुलटाका उपदेश।

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इसी तरह, एक मियँा जी भी ज्ञानमाज़ बिछा कर नमाज़