वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४२ )
कमाल इश्क है ऐ दाग़, महव हो जाना ।
मुके ख़बर नहीं, नफ़ा क्या ज़रूर कैसा ? ॥
प्रेममें जो लोग तन्मय हो जाते हैं, उन्हींका प्रेम—प्रेम है । विना तन्मयताके प्रेम थोथा है । मैं तन्मय हूँ, इसलिये मुझे घाटे लाभकी फ़िक्र तो क्या, ख़बर ही नहीं ।
कबीर कहते हैं—
प्रेम-प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
घाठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
लौ लागी जब जानिये, झूटि न कबहुँ जाय ।
जीवन लौ लागी रहे, सूझा भौहि समय ।
कबीर साहब कहते हैं,—प्रेम-प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेमको कोई नहीं जानता । जिसमें आठ पहर डूबा रहे, वही प्रेम है । लौ लगी तभी समझो, जबकि लौ झूट न जाय । जिन्दगी-भर लौ लगी रहे और मरने पर प्यारमें समा जाय ।
चित्तका स्वभाव है, कि वह अगली-पिछली बातोंको याद करता है । इन्द्रियों का स्वभाव है कि, वे अपने-अपने विषयों की ओर झुकती हैं । कान आवाज़ सुनना चाहता है । नेत्र नई वस्तु देखना चाहते हैं ; पर इस तरह ईश्वर-उपासना
— इश्क=प्रेम । महव हो जाना=तन्मय हो जाना ; गर्क हो जाना । नफ़ा=लाभ । ज़रूर=हानि ; मुकसान ।