वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संसारी माया-जालमें सुख नहीं है। संसारमें जो सुखी दीखते हैं, वे भी वास्तवमें दुखी हैं। उनका सुख दिखावटी सुख है, सच्चा सुख नहीं। हम उन्हें गाड़ी और मोटरोंमें चढ़ते देख, बढ़िया-बढ़िया महलोंमें आनन्द करते देख, उनके यहाँ द्रव्यकी बहुलता देख, सुखी समझते हैं; पर वास्तवमें वे सुखी नहीं हैं। असल बात यह है कि संसारमें सुख है ही नहीं। सुख केवल संसार-त्याग या "वैराग्य" में है। इसीलिये कहनेवाला कहता है, वे दिन कब आवेंगे, जब हम गङ्गा-किनारे, हिमालयकी शिलापर बैठ, पद्मासन लगाकर, ब्रह्मके ध्यान में लीन होंगे? उस ध्यानमें जब हमारी सुख-बुध जाती रहेगी, उस समय बूढ़े हिरन हमें जीता-जागता मनुष्य न समझ, कोई निर्जीव पदार्थ समझ, निःशङ्क होकर, हमारे शरीरसे अपना शरीर रगड़-रगड़कर, अपने शरीरकी खुजली मिटायेंगे। जिन पुरुषोंको यह सुख प्राप्त है, वही सच्चे सुखिया हैं—उन्हींका जीवन धन्य है!
प्रेमिकके प्रेममें तन्मय हो जानेमें ही मञ्जु है। जब पूरी-तरहसे ध्यान लग जाता है, तब शरीर पर पक्षी बैठे या जानवर, खुजली मिटावे या चाहे जो करें, कोई ख़बर नहीं रहती। ऐसे ध्यानियोंको ही सिद्धि मिलती है। महाकवि दाग कहते हैं:—
को भोगना। रचि करें = चाहता है। तन=शरीर। क्षणभंग=पलमें नाश होने वाला।