वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४८ )
अथो गंगा सेयं पदमुपगता स्तोत्रमथवा विवेकअष्टांशं भवति विनिपातः शतमुखः ॥४४
देखिये, गंगा स्वर्गसे शिवजीके मस्तक पर गिरी ; उनके सिर से हिमालय पर्वत पर ; हिमालय पर्वतसे पृथ्वीपर ; और पृथ्वीसे समुद्रमें गिरी । इससे मालूम होता है, कि विवेक-हीनोंका पद-पद पर सैकड़ों प्रकारसे पतन होता है ॥४४॥
जो विचारपूर्वक काम नहीं करते, जो अकलसे काम नहीं लेते, उनको तरह-तरहसे नीचा देखना पड़ता है । कविने यहाँ गङ्गाका दृष्टान्त दिया है और खूब दिया है ।
शिक्षा—जो विवेक-हीन हैं, जो अहङ्कारी हैं, वे सदा नीचा देखते और बार-बार नीचे गिरते हैं ; अतः मनुष्यको भूलकर भी घमण्ड न करना चाहिये और खूब विचार कर काम करना चाहिये । गंगाको बड़ा घमण्ड हुआ, तब उसका गर्व खर्च करनेके लिए ब्रह्माने उसे अपने कमण्डलमें भर लिया । गंगाका मस्तक नीचा हो गया । फिर भी ; उसने घमण्ड न छोड़ा, तब शिव जीने उसे अपनी जटाओंमें रोक लिया । फिर महाराजा अगीरथने बार तप किया, तो शिवजीने उसे छोड़ा । शिवके सिरसे वह हिमालय पर गिरी और वहाँ से बहती-बहती समन्दरमें जा गिरी । जो गर्व करते हैं, जगदीश उनके दुर्गमव हो जाते हैं । जगदीश उन्हीं को मिलते हैं, जो गवसे दूर भागते और विवेकभुष्ट नहीं होते ।
श्लेष सादी ने कहा है—
हकैं बेहूदा गर्दन अफ़राज़द । लेखतन रा बगर्दन श्रन्दाज़द ॥