भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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मित्र मानता है ; किसीके साधने दीनता नहीं करता, किसी से कुछ नहीं माँगता ; वटवृक्षके आश्रयमें रहकर भगवान् का भजन करता और वटवृक्षको ही अपने दुःख-सुखको संगिनी प्राणवल्लभा समझता है, वही पुरुष धन्य है ! उसका ही जगत् में आना सफल है । परमात्माकी दया या पूर्वजन्मके पुण्योंसे ही ऐसी बुद्धि होती है । ऐसी बुद्धिके प्रभावसे ही वह दुःखोंसे छूटकर नित्यानन्दमें मग्न रहता है ।

दोहा ।

देव ईश सुरसरि सरित, दिशा वसन गिरि गेह ।

सुहत्काल वट कामिनी, वत अदैन्य सुख एह ॥४३॥

43. Let the Great God be the only god for us, the heavenly angels the only river, a cave the only house, the direction of the open space the only clothing, time the only friend and the vow of non-supplication the only vow. What more should he say than that a banyan tree in the forest may be our only better half ?

शिरः शार्दे स्वर्गीत्यशुपतिशिरस्तः चित्तिधरं

महीभ्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम् ॥

देव=देवता । ईश=महादेव । सुरसरि=देवनदी=गंगा । दिशा=दशों दिशाएँ । वसन=कपड़ा । गिरि=पहाड़ । गेह=घर । दिशा वसन=दिशाओंको ही कपड़े मान कर नङ्गा रहना । सहद=मित्र । काल=सूर्य । वट=बड़का पेड़ । कामिनी=स्त्री । अदैन्य=न माँगना ; हाथ न पसारना ।