वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२५ )
जिनसे हमने जन्म लिया था, उन्हें इस दुनियासे गये बहुत दिन हो गये ; जिनके साथ हम बड़े हुए थे, वे भी इस दुनियाको छोड़कर चले गये । अब हमारी दशा भी रेतीले नदी-किनारेके बूँदोंकी सी हो रही है, जो दिन-दिन जड़ छोड़ते हुए गिराऊ होते चले जाते हैं ॥२८॥
जिनसे हम पैदा हुए थे, उन्हें इस दुनियासे गये जमाना गुजर गया और जिन लोगोंके साथ हम जन्मे थे अथवा जो लोग हमारे समवयस्क थे, वे भी चल बसे ; जिन लोगोंके साथ हम पले, जिनके साथ हम खेले-कूदे, जिनके साथ हमने कारोबार किया, वे सब भी कालके गालमें समा गये । अब हमारा नम्बर भी आया ही समझिये—अब हम भी चलने ही वाले हैं । दिन-दिन हमारा शरीर क्षीण हुआ जाता है । हमारी दशा अब नदी-तटके बालूमें लगे हुए वृक्षों कीसी है, जिनके गिरने की संभावना हर घड़ी रहती है । हमारी पेसी हालत है, फिर भी आश्चर्य है, कि हमारा माया-मोह नहीं छूटता ! अब भी हमारा मन नहीं समझता और वह संसारी जजालोंसे अलग होना नहीं चाहता ! महात्मा कबीर भी यही कहते हैं । उनकी सुन लीजिये :—
बारी बारी आपनी, चले पियारे मित ।
तेरी बारी जीवरा, नियरे आवे नित ॥