भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३२६ )

माली आवत देखिकै, कलियाँ करी पुकार ।

फूली-फूली जुनि लई, कलह हमारी बार ॥

साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार ।

कागदमें बाकी रही, तारों लागी बार ॥

बारी-बारीसे सभी प्यारे और मित्र चल बसे । अरे जीव ! अब तेरा नम्बर भी नित्य निकट आता-जाता है । मालीको आते देख कर, कलियोंने कहा—फूली-फूली तो आज चुन ली गई, कलह हमारी भी बारी है । हमारे साथी कले रथे अब हम भी चलने वाले हैं । कागजमें यानी खातेमें कुछ साँस बाकी रह गये हैं, इससे देर हो रही है ; यानी अपने श्रेष्ठ साँसों को पूरा करनेके लिए हम उहरे हुए हैं ।

संसारका यही हाल है, रोज ही यह तमाशा देखते हैं ; पर फिर भी हमें होश नहीं होता !

छप्पय ।

जो जन्मे हम संग, उतौ सब स्वर्ग सिधारे ।

जो खेले हम संग, काल तिनहुँ कहँ मारे ।

मिंत=मित्र । जीवरा=हे जीव ! नियरे=नजदीक । नित= नित्य, रोज । बार=बारी । चालनहार=चलने वाले, भरने वाले । बार=देर ॥

उतौ=वे तो । तिनहुँ कह=उनको भी । दीसत=दीखता है ।

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