वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ३२६ )
माली आवत देखिकै, कलियाँ करी पुकार ।
फूली-फूली जुनि लई, कलह हमारी बार ॥
साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार ।
कागदमें बाकी रही, तारों लागी बार ॥
बारी-बारीसे सभी प्यारे और मित्र चल बसे । अरे जीव ! अब तेरा नम्बर भी नित्य निकट आता-जाता है । मालीको आते देख कर, कलियोंने कहा—फूली-फूली तो आज चुन ली गई, कलह हमारी भी बारी है । हमारे साथी कले रथे अब हम भी चलने वाले हैं । कागजमें यानी खातेमें कुछ साँस बाकी रह गये हैं, इससे देर हो रही है ; यानी अपने श्रेष्ठ साँसों को पूरा करनेके लिए हम उहरे हुए हैं ।
संसारका यही हाल है, रोज ही यह तमाशा देखते हैं ; पर फिर भी हमें होश नहीं होता !
छप्पय ।
जो जन्मे हम संग, उतौ सब स्वर्ग सिधारे ।
जो खेले हम संग, काल तिनहुँ कहँ मारे ।
मिंत=मित्र । जीवरा=हे जीव ! नियरे=नजदीक । नित= नित्य, रोज । बार=बारी । चालनहार=चलने वाले, भरने वाले । बार=देर ॥
उतौ=वे तो । तिनहुँ कह=उनको भी । दीसत=दीखता है ।
( १२७ )
हमहूँ जरजर देह ; निकट ही दीसत मरिबो !
जैसे सरिता-तीर-वृक्ष को, तुच्छ उखरिबो ।
अजहूँ नहिँ छाँड़त मोह मन, उमग-उमग उरभो रहत ।
ऐसे अचेतके संग सों, न्याय जगत को दुख सहत । ३८॥
38. Those with whom we were born have long ere this passed away from this world. Those with whom we grew up have also shared the similar fate. Our condition now is like that of the trees growing on a sandy river-bank which are gradually crumbling away from day to day.
यज्ञानेके कचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यैको
यज्ञाप्येकस्तदुख बहवस्तल चान्ते न चैकः ॥
इत्थं चेभ्यो रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाचौ
कालः काल्या सह बहुकलः कीडति प्राणिशरैः ॥३६॥
जिस घरमें पहले अनेक लोग थे, उसमें अब एक ही रह गया है । जिस घरमें एक था, उसमें अनेक हो गये, पर अन्तमें एक भी न रहा । इससे मालूम होता है, कि काल देवता, अपनी पत्नी कालीके साथ, संसार-रूपी चौपड़में, दिन-रात-रूपी पासोंको लुढ़का-लुढ़का कर और इस जगत्के प्राणियोंकी गोटी बना-बना कर, खेले रहा है ॥३६॥
मरिबो=मरना ; मरैत । सरिता=नदी । तीर=किनारा । अजहूँ=अब तक । उरभो=फस ।
( १२८ )
जिस घरमें पहले पुत्र, पौत्र, पुत्र-बधू, पौत्र-बधू, पुत्री, दो-हिते और दोहिती प्रभृति अनेक लोग थे, आज वह सुतासा हो गया है, उसमें आज एक ही आदमी नज़र आता है। जिस घरमें पहले एक आदमी था, उसका कुटुम्ब इतना बढ़ा कि सैकड़ों हो गये; पर आज देखते हैं, उसमें एक भी नहीं है। घर का ताला लगा है, भीतर लम्बी-लम्बी घास उग आई है, दीवारें गिर रही हैं, छतें चू रही हैं और ईंटे दाँत दिखा रही हैं। अब उस घरमें चमगीदड़, उलू, साँप और बिच्छू प्रभृति रहते हैं। महात्मा कबीर कहते हैं—
दोहा
ऊँचा महल चिनाइया, सुवरन कली बुलाय । ते मन्दिर खाली परे, रहे मसाना जाय ॥ मलमल खासा पहरते, खाते नागर पान । टेढ़े होकर चालते, करते बहुत गुमान । महलन माँही पौढ़ते, परिसल अंग लगाय । ते सुपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥
जिनहोने ऊँचे-उच्चे महल चिनवाये थे और उनमें सुनहरी काम कराये थे, वे आज श्रमशालनमें चले गये हैं और उनके
घरनकली=घनहरी कली-चना। बुलाय=मँगा कर। ते=वे। मन्दिर=महल। मसाना=श्रमशालन। गुमान=घमण्ड। पौढ़ते=सोते। परिसल=कुष। दीसे=दीखे।
( १२६ )
बनवाये हुए महल सूने पड़े हैं। जो मलमल और खासा पहनते थे, नागर-पान खाते थे, अकड़-अकड़ कर टेढ़े-टेढ़े बलते थे, अभिमानके नशेमें चूर हुए जाते थे और बदनेमें इत्र, फुलेल और सेण्ट प्रभृति लगाकर महलोंमें साते थे, वे स्वप्नमें भी नहीं दीखते। देखते-देखते न जाने कहाँ गायब हो गये !
छप्पय ।
बहुत रहत जिहि धाम, तहाँ एकहिको राखत ।
एक रहत जिहि ठौर, तहाँ बहुतहि अभिलाषत ।
फेर एकहू नाहि, करी तहाँ राज दुराजी ।
कालीके संग काल, रची चौपड़की वाजी ।
दिनरात उभय पास लिखे, इहि विधिसें क्रीड़ा करत ।
सत्र वाशी सोबत सार ज्यों, मिलत चलत बिछुरत मरत ॥३६॥
39. In homes where there were many members before, there is only a single one left now i. e., out of innumerable members only one is survived. In families, which consisted of a single person at first but had multiplied afterwards, not a soul has been left in the end. Thus the changeable god of Time is playing at dice with his wife Kali, the goddess of destruction, using Day and Night as a pair of dice for casting and laying poor mortals at stake on each turn.
जिहि=जिस। धाम=घर। तहाँ=उसमें। ठौर=जगह। उभय= दोनों। क्रीड़ा करत=खेलते हैं।
६
( १३० )
तपस्यन्तः सन्तः किमपिनिवसायः सुरनदी
गुणोदारान्दाराजुत परिचयामः सविनयम् ॥
पिबामः शास्त्रौषाडुतविविधकाभ्यामृतरसा-
त्र विघ्नः किं कुर्मः कतिपयनिषेधायुधि जने ॥४०॥
हमारी समझमें नहीं आता, कि हम इस अरूप जीवन—इस छोटीसी जिन्दगीमें क्या-क्या करें अर्थात् हम गंगा-तट पर बस कर तप करें अथवा गुणवती स्त्रियोंकी प्रेम-सहित यथायोग्य सेवा करें अथवा वेदान्त शास्त्रका अमृत पिये या काव्यरस पाने करें ॥४१॥
कहने वाला कहता है और ठीक ही कहता है—यह जीवन क्षणभरका है। इस चन्द्रशेखा जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? काम तो अनेक है, पर समय थोड़ा है। गंगातट पर जाकर शिव-शिव की रट लगाना भी अच्छा है; गुणवती सुन्दरियों के साथ मीठी-मीठी बातें बोलना, उनके सङ्ग रहना और उनके साथ रमण करना भी भला है। वेदान्त शास्त्रके मर्म को समझना और उसका अमृत-रस पीना या काव्य-रस पीना भी अच्छा है। अच्छे सब हैं और सभी करने योग्य हैं; पर हमारी समझमें नहीं आता, कि एक क्षणभरकी जिन्दगीमें हम क्या-क्या करें? मतलब यह है, कि मनुष्य-जीवन बहुत ही थोड़ा है। इसलिये मनुष्यको, जब तक दम रहै, सब तज कर
( १३१ )
एकमात्र परमात्माका भजन करना चाहिये। कबीरदास कहते हैं—
यह तन काँचा कुम्भ है, माँहि किया रहवास । “कबिरा” नैन निहारिया, नहीं पलककी आस ॥ “कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नाही काल । चेत सके तो चेतिये, मीच परी है ख्याल ॥ “कबिरा” सुपने रैनके, उधरि आये नैन । जीव परा बहु लूटमें, जागूँ तो लेन न देन ॥ आजकाल कि पाँच दिन, जंगल होयगा बास । ऊपर-ऊपर हल फिरै, ढोर चरगे घास ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—
“तुलसी” जगमें आइके, कर लीजे दो काम । देवको टुकड़ा भलों, लेवेको हरि-नाम ॥ “तुलसी” राम-सनेह कर, त्यागु सकल उपचार । जैसे घटत न अंक नौ, नौ के लिखत पहार ॥
तन=शरीर । काँचा कुम्भ=कच्चा घड़ा । माँहि किया रहवास=भीतर जीव रहता है । नैन निहारिया=आँखोंसे देखा । मीच=मौत । छपने रनके=रातके छपने । उधरि आये=खुल गये । आजकाल कि पाँच दिन=आज, कल अथवा पाँच दिन बाद । ढोर=गाय भैंस प्रभृति मवेशी ।
टुकड़ा=रोटोका टुकड़ा । रामसनेह कह=रामसे प्रेम कर । त्यागु सकल उपचार=सारे आंकट छोड़ । घटत न अंक नौ=नौका अंक नहीं घटता—
( १३२ )
जग ते रहूँ छत्तीस हवैं, राम-वरन छत्तीन ।
“तुलसी” देखु विचारि हिय, है यह मतो प्रवीन ॥
यह मनुष्य-शरीर मिट्टीके कच्चे घड़ेके जसा है। इसीके अन्दर जीवात्मा रहता है। कबीरदासजी कहते हैं, आँखोंसे देखा है, एक क्षणकी भी आशा नहीं। खुलासा यह कि, जिस शरीरमें जीवात्मा रहता है, वह कच्चे घड़ेके समान क्षणभङ्गुर है। जिस तरह कच्चे घड़ेको फूटते देर नहीं; उसी तरह इस कच्चे घड़े-जैसे शरीरको नाश होते देर नहीं। कौन जाने किस क्षण यह शरीर-रूपी कच्चा घड़ा फूट जाय और इसमेंसे जीवात्मा निकल जाय ? इसकी आशा उतनी देरकी भी नहीं, जितनी देर कि पलकके भपनेमें लगती है !
कबीरदास कहते हैं, जो दिन आज है, वह कल न होगा। जीव ! चेत सके तो चेत ! मौत सिरपर सवार है।
जो अज्ञानी बरसोंका प्रबन्ध करते हैं, बरसों जीने की आशा करते हैं, वे इस बचनसे शिक्षा ग्रहण करें। कबीर-दास बरसों छोड़—दो चार दिन भी जीवन रहनेकी आशा नहीं करते। वे कहते हैं, आज हो, कल रहो या न रहो। आज तुम हँस-खेल रहे हो, आज तुम्हारा शरीर आरोग्य है, आश्चर्य्य नहीं, कल तुम बीमार होकर मरण-शय्यापर पड़े हो
बना रहता है। नौके लिखत पहार—नौका पहाड़ों लिखनेसे। जगते रहूँ छत्तीस हवैं—जगत्को पीठ दो, संसारको त्याग दो। रामवरन छत्तीन=राम के चरणोंके सम्मुख ई और ३ की तरह रहो—रामसे प्रेम करो।
( १२३ )
अथवा मर ही जाओ । इस्लिये चेत करो, होश संभालो और आगेकी सफ़रका बन्दोबस्त करो । अगर सँसारके जज़ालमें फ़से हुए, जीवनकी लम्बी आशा रक्खे हुए, शीघ्र ही, आज ही, अभी, इसी क्षणसे अगली यात्राका प्रबन्ध न करोगे ; वहाँ मिलनेके लिये—यहाँके ईश्वरीय बैंक द्वारा—रुपये-पैसे, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, महल-मकान और बाग-बगीचोंका बन्दोबस्त न करोगे—इस दुनियामें पराया दुःख दूर न करोगे और मालिकका नाम न जपोगे ; तो तुम्हें उस लम्बी सफ़रमें बड़ी-बड़ी तकलीफ़ोंका सामना करना पड़ेगा । यहाँ बोओगे, तो वहाँ काटोगे । यहाँ अच्छा करोगे, तो वहाँ अच्छा पाओगे । यहाँ गरीब और मुहताजोंको दोगे, तो वहाँ आपको मिलेगा ।
कबीरदास कहते हैं, यह जीवन सुपनेके समान है । रातको सुपनेमें देखा कि जीव लूटमें पड़ा है, तरह-तरहके ऐश-आराम कर रहा है, सुख-भोग भोग रहा है ; लेकिन ज्योंही आँख खुली तो क्या देखता हूँ, कि कुछ भी नहीं है । जिस तरह सुपनेमें आदमी दिलको फरहत देनेवाले बाग-बगीचोंकी सैर करता है, माशूकाके गलेमें हाथ डाले घूमता है, उससे सम्भोग करता है ; अथवा राजा हो जाता है, हक़मत करता है, चन्द्रबदनियों का नाच-गान देखता है और मन-ही-मन बड़ा खुश होता है ; पर ज्यों ही आँख खुलती है, तो न बाग-बगीचे दीखते हैं और न माशूका और राज-पाट । बस, ठीक यही हाल जाग्रत अवस्थाका है । जिस तरह रातके सुपनेको मिथ्या समझते
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हो, उसी तरह दिनेके दृश्योंको भी मिथ्या समझो। वह सुपना सोई हुई-हालतमें दीखता है और यह जागते हुए। देखते हैं, आज एक आदमी राजा है, हज़ारों तरहके भोग भोग रहा है; पर कल ही वह राहका भिखारी बन जाता है। आज किसीके घरमें सुन्दरी पतिव्रता नारी है, आत्माकारी पुत्र-पौत्र है, सुशीला पुत्रबहुएँ और कन्यायें हैं, सैकड़ों दास-दासी हैं, द्वापर हाथी झूमता है, मोटर हर समय दरवाज़ेपर खड़ी रहती है; चन्द रोज बाद देखते हैं, कि वही आदमी गुदड़ी ओढ़े हुए सड़कपर भीख माँग रहा है। पूछते हैं, क्योंजी तुम्हारा यह क्या हाल? तुम्हारे कुटुम्बी और धन-दौलतका क्या हुआ? जवाब देता है—भाई! प्लेगमें सारे घरके लोग मर गये। कोई पानी देने और नाम लेनेवाला भी न रहा। धन-दौलतमेंसे कुछको चोर और शेषको डाकू डाका डालकर ले गये। जब खानेका भी ठिकाना न रहा, तब प्राणरक्षार्थ भीख माँगना आरम्भ किया है। कहिये, ऐसे जीवन और सुख-भोगोंको सुपनेकी माया न कहें तो क्या कहें?
अभी कलकी बात है, हमारी एक आँखोंकी पुतलीके समान प्यारी पुत्री हमें छोड़कर चली गयी। वह ऐसी रूपवती थी, कि हम उसे देखकर कहा करते थे,—विधाताने खूब फुसलतमें गड़ी है। उसके देखनेसे हमारी शोकसन्तप्त आत्माको शान्ति मिलती थी। चोर शोकमें गुराँ होनेपर भी उसे देखकर हम खिल पड़ते थे। हमारे दिनभरके रंजोगम काफ़र हो जाते
( ३३५ )
थे। उसके दशनोंसे हमारे हृदयमें सुख होता था, इसीसे हम उसे 'दिलाराम' भी कहा करते थे। नाम उसका दिलाराम नहीं—सूर्यकांता था। जब हम घरमें बैठे हुए पूछ देखा करते थे, वह भोली सूरत घुटुअन चलकर हमारे पास आजाती। कभी हमारी दावात उठट देती, कभी कूलम उठा लेती और कभी प्रूफके कागज़ोंको मुँहमें देने लगती। जब हम आनन्दमें मश हो जाते, कूलम पटककर उसे उठा लेते। उसको चूमते, प्यार करते और हृदयको शीतल करते थे। आज तीन दिनसे वह नहीं है। कहीं नज़र नहीं आती। ऐसा जान पड़ता है, गोया हमने उसे सुपनेमें देखा था। सुपनेमें ही वह हमारे पास आयी थी। सुपनेमें ही अपने बचपनके खेलोंसे उसने हमें खुश किया था और सुपनेमें ही हमने उसे प्यार-दुलार किया था। पाठक ! आपही विचारिये। क्या यह सब सुपना नहीं था ? क्या अब जो हमारे प्यारे हमारे साथ हैं, हमारे सामने फिरते-डोलते और काम-धन्धा करते हैं, उनको भी हम सुपनेकी आया न समझे ? उस डेढ़ सालकी बच्चीकी तरह ही, हम भी एक दिन सबको छोड़कर यमसदनके राही न होंगे ? हमारे पीछे जो रह जायेंगे, उन्हें हम सुपनेमें मिले हुएके समान न दीखेंगे ? यद्यपि हमने अभीतक घर-गृहस्थी नहीं त्यागी है। अभी हम संसारी जंजालोंमें पँसे हुए हैं, तोभी हम अपने प्यारे-से-प्यारके बरनेपर भी आँखोंसे आँसु नहीं डालते। बहुत लोग हमारे इस हालको देखकर अचम्भा करते हैं। कोई कुछ और कोई
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कुछ कहता है। पर हमारे न रोने-कूकनेका कारण यह है कि, हमने इस संसारमें घिसे-घिसे बहुतसे दुःख देखे हैं। हम कई प्राण-प्यारोंकी वियोगाश्रितमें जले हैं। इसीसे अब हम समझ गये हैं कि, यह सब सुपना है। एक दिन न एक दिन हम भी सबको छोड़कर चल देंगे अथवा और सब जो हमारी आँखोंके सामने मौजूद हैं—हमारे देखते-देखते, सुपनेमें देखे हुआओंकी तरह, गायब हो जायेंगे।
कबीरदास कहते हैं,—अरे भाई! आज अथवा कल अथवा पाँच दिन बाद तुम्हारा बसेरा जंगलमें होगा। तुम्हारे ऊपर हल चलेंगे अथवा तुम्हारे ऊपर उगी हुई घासको गाय भैंस आदि पशु चरेंगे। खुलासा यह है, कि तुम कदाचित आज ही मर जाओ; अगर आज बच गये तो कल खेर नहीं। अगर साँस पूरे न हुए होंगे—वित्रयुतके खातेमें तुम्हारे कुछ साँस बाकी होंगे, तो उनके पूरे होनेपर पाँच या दस दिन बाद तुम अवश्य मरोगे। तुम इस शरीरमें सदा न रहोगे। तुम्हारे देह छोड़ते ही, लोग तुमसे घुणा करेंगे। खास तुम्हारी हृदयेश्वरी ही तुम्हारी सूरत देखकर डरेगी। तुम्हारे बदनपर अगर एक चाँदीका छल्ला भी होगा, तो उसे उतार लेगी। लोग तुम्हें लेजाकर जला या गाड़ आवेंगे। जिस जगह तुम जलाये या दफनाये जाओगे—जहाँ तुम्हारे शरीरकी खाक पड़ी होगी, उसी जगह किसान हल चलावेंगे। यदि तुम्हारी मिट्टीपर घास उग आयेगी, तो दोर चौपे उसे चरेंगे। अतः होशियार हो जाओ ! गफ़लतकी
( १३७ )
नींद त्यागो और अपनी अवश्यभावी यात्राका प्रबन्ध करो, जिससे राहमें तुम्हें किसी वस्तुका अभाव और किसी तरहकी तकलीफ न हो।
इस दुनियामें काम बहुत हैं और उग्रका यह हाल है कि, पलक मारने भरका भरौसा नहीं। इस क्षण-भरकी ज़िन्दगीमें कौनसा काम करना चाहिये, जिससे आगेकी यात्रामें सुख-हो-सुख मिले?—यही सवाल ऊपर उठाया गया है। इस सवालको ईश्वर तक पहुँचे हुए, ईश्वरके सच्चे और प्रथम श्रेणीके भक्तवर गोस्वामि तुलसीदास जीने बहुत ही खूबसूरतीसे हल कर दिया है। उन्होंने मनुष्यके लिए दो ही काम चुन दिये हैं—“देवोको दुकड़ा भला और लेवेको हरनाम।” उनकी इन दो बातोंपर जो अमल करेंगे, निश्चय ही उनको सुख-ही-सुख है। उन्हें नरकोंकी भीषण यन्त्रणायें न सहनी होंगी। वे स्वर्गमें नाना प्रकारके सुख भोगेंगे और अमृतपान करेंगे, कल्पतरु उनकी इच्छाओंको पूरी करेगा। अगर वे पराया भला करके, दुखियाओंके दुःख दूर करके, बदला या मुआविज़ा पानेकी इच्छा न करेंगे; निष्काम कर्म करेंगे और कृष्णके प्रेममें गूँक हो जायेंगे, उसके सिवा किसी भी संसारी पदार्थको न चाहेंगे; तो उन्हें वह चीज़ मिलेगी, जो हज़ारों-लाखों स्वर्गोंसे भी बढ़-चढ़कर होगी; फिर उन्हें कभी दुःखका नाम भी न सुनना पड़ेगा। यही बात महात्मा तुलसीदासजीने अपने दोहोंमें कही है; उन्हें खाली पढ़िये हो नहीं, उनपर गौर भी कीजिये। बिचारनेसे
( १३८ )
उनकी बातें आपके दुःख और क्लेश नाश करने वाली अल्पर्थ महौषधियाँ जान पड़गी। अगर आप उनकी बताई हुई दवा पीयेंगे, तो आप अजर अमर हो जायेंगे।
तुलसीदासजी कहते हैं :—संसार में आकर दो काम कर लो :—(१) भूखों को भोजन दो, और (२) भगवान् का नाम लो।
तुलसीदासजी कहते हैं :—कर्म, ज्ञान और उपासना प्रभुति उपचारोंको त्याग कर भगवान्की भक्ति करो, क्योंकि भक्तिये विषयी लोगोंको भी मुक्ति मिल सकती है; किन्तु कर्म, ज्ञान और उपासना आदिसे नहीं। जैसे ६ का पहाड़ा लिखनेसे ६ का अङ्क नहीं मटता, वैसे ही कर्म ज्ञान आदि से वासना नहीं मिटती और जब तक वासना बनी रहती है तब तक मुक्ति हो नहीं सकती। वासना ही तो जन्म-मरणकी जड़ है, वासनासे ही जन्म लेना पड़ता है; वासना मिटी और मुक्ति हुई; पर विषयी लोगोंकी वासना नहीं मिटती। जिस तरह नौका पहाड़ा लिखनेसे नौ का अङ्क बना ही रहता है; उसी तरह उनके कर्म-ज्ञान और उपासनादि उपचार करने पर भी वासना बनी ही रहती है। नौका पहाड़ा लिखने पर नौ का अङ्क कैसे बना रहता है, नीचे देखिये :—
१ = ६
१८ = ६
२७ = ६
( १३६ )
| ३६ | ३ + ६ = ९ |
|---|---|
| ४५ | ४ + ५ = ९ |
| ५४ | ५ + ४ = ९ |
| ६३ | ६ + ३ = ९ |
| ७२ | ७ + २ = ९ |
| ८१ | ८ + १ = ९ |
| ९० | ९ + ० = ९ |
इस दहेिका अर्थ हमने साधारणतया समझा दिया है। अगर हम और भी खुलासा समझावें, तो ३४ पैरों खर्च होंगे। मतलब यह, मुक्ति-लाभ करनेके लिये “भक्ति” सीधा और सरल उपाय है। नारद, वाल्मीकि और शबरी प्रभृति भक्तिके प्रभाव से ही ऊंचे चढ़े हैं—कर्म, ज्ञान और उपासनादिसे नहीं।
जगत् से ३६ की तरह और भगवान्के चरणोंमें—छः तीन या तिरसठकी तरह रहो। तुलसीदासजी कहते हैं, मनमें विचार कर देख लो, यह मता अत्युत्तम है।
६ जगत् है और ३ मनुष्य है। ३६ के अङ्कमें ३ ने ६ को पीठ दे रखी है। बस, इसी तरह तुम जगत्को पीठ दे कर रहो; यानो संसारकी ओर मत देखो, संसारमें ममता मत रखो। दूसरी ओर भगवान्के पक्षमें ६३ को तरह रहो। इसमें ६ भगवान् की शरण है और ३ मनुष्य है। जिस तरह ३ का अङ्क ६ को ओर टकटकी लगाये देख रहा है; उसी तरह मनुष्यको हरदम जुगदीशाकी शरणमें टकटकी लगाये हुए रहना चाहिए।
( १४० )
दोहा ।
तप तीरथ तरुणी-रमण, विद्या बहुत यशंग ।
कहा-कहा मन रुचि करै, पायौ तन क्लशभंग ॥४०॥
40. Should we sojourn by the banks of the heavenly river Ganges practising penances, or should we enjoy the company of women possessing the high qualities of beauty etc, always addressing them in a befitting manner, or should we drink in the ambrosial essence of the religious books or literary treatises ? We are quite at a loss to know which course we should have recourse to in so short a life,
गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य
ब्रह्मव्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य ॥
किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्वल ते निर्विशंकाः
संप्राप्त्यन्ते जरठहरिणाः शुभकंङ्कविनोदम् ॥४१॥
अहा ! वे सुखके दिन कब आवेंगे, जब हम गंगा-किनारे, हिमालयकी शिलाओं पर, पद्मासन लगाकर, विधान-अनुसार शौख मँद कर, ब्रह्मका ध्यान करते हुए, योग-निद्रामें मग्न होंगे और बूढ़े-बूढ़े हिरन निर्भय हो, हमारे शरीरकी रगड़से, अपने शरीरकी खुजली मिटाते होंगे ? ॥४१॥
तप = तपस्या । तीरथ = तीर्थ, पवित्र धाम । तरुणी-रमण = युवतियों
हरामयशोक ६६
ये सुख के दिन कब आयेंगे, जब हम ( इन योगीराज की तरह ) गंगातट पर पद्मासन लगा, योगनिद्रा में मग्न होंगे और सूँह-सूँहें हिरन हमारे शरीर की रगद से अपने खुशली मिटाते होंगे ?
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( १४१ )
संसारी माया-जालमें सुख नहीं है। संसारमें जो सुखी दीखते हैं, वे भी वास्तवमें दुखी हैं। उनका सुख दिखावटी सुख है, सच्चा सुख नहीं। हम उन्हें गाड़ी और मोटरोंमें चढ़ते देख, बढ़िया-बढ़िया महलोंमें आनन्द करते देख, उनके यहाँ द्रव्यकी बहुलता देख, सुखी समझते हैं; पर वास्तवमें वे सुखी नहीं हैं। असल बात यह है कि संसारमें सुख है ही नहीं। सुख केवल संसार-त्याग या "वैराग्य" में है। इसीलिये कहनेवाला कहता है, वे दिन कब आवेंगे, जब हम गङ्गा-किनारे, हिमालयकी शिलापर बैठ, पद्मासन लगाकर, ब्रह्मके ध्यान में लीन होंगे? उस ध्यानमें जब हमारी सुख-बुध जाती रहेगी, उस समय बूढ़े हिरन हमें जीता-जागता मनुष्य न समझ, कोई निर्जीव पदार्थ समझ, निःशङ्क होकर, हमारे शरीरसे अपना शरीर रगड़-रगड़कर, अपने शरीरकी खुजली मिटायेंगे। जिन पुरुषोंको यह सुख प्राप्त है, वही सच्चे सुखिया हैं—उन्हींका जीवन धन्य है!
प्रेमिकके प्रेममें तन्मय हो जानेमें ही मञ्जु है। जब पूरी-तरहसे ध्यान लग जाता है, तब शरीर पर पक्षी बैठे या जानवर, खुजली मिटावे या चाहे जो करें, कोई ख़बर नहीं रहती। ऐसे ध्यानियोंको ही सिद्धि मिलती है। महाकवि दाग कहते हैं:—
को भोगना। रचि करें = चाहता है। तन=शरीर। क्षणभंग=पलमें नाश होने वाला।
( १४२ )
कमाल इश्क है ऐ दाग़, महव हो जाना ।
मुके ख़बर नहीं, नफ़ा क्या ज़रूर कैसा ? ॥
प्रेममें जो लोग तन्मय हो जाते हैं, उन्हींका प्रेम—प्रेम है । विना तन्मयताके प्रेम थोथा है । मैं तन्मय हूँ, इसलिये मुझे घाटे लाभकी फ़िक्र तो क्या, ख़बर ही नहीं ।
कबीर कहते हैं—
प्रेम-प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
घाठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
लौ लागी जब जानिये, झूटि न कबहुँ जाय ।
जीवन लौ लागी रहे, सूझा भौहि समय ।
कबीर साहब कहते हैं,—प्रेम-प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेमको कोई नहीं जानता । जिसमें आठ पहर डूबा रहे, वही प्रेम है । लौ लगी तभी समझो, जबकि लौ झूट न जाय । जिन्दगी-भर लौ लगी रहे और मरने पर प्यारमें समा जाय ।
चित्तका स्वभाव है, कि वह अगली-पिछली बातोंको याद करता है । इन्द्रियों का स्वभाव है कि, वे अपने-अपने विषयों की ओर झुकती हैं । कान आवाज़ सुनना चाहता है । नेत्र नई वस्तु देखना चाहते हैं ; पर इस तरह ईश्वर-उपासना
— इश्क=प्रेम । महव हो जाना=तन्मय हो जाना ; गर्क हो जाना । नफ़ा=लाभ । ज़रूर=हानि ; मुकसान ।
( १४३ )
करनेसे कोई लाभ नहीं। तथा अशूल्य समय नष्ट करना है। ईश्वर-उपासना करने वालेको, सबसे पहले, अपने चित्त और इन्द्रियोंको, उनके कामोंसे हटा कर, अपने अधीन कर लेना चाहिये। बिना चित्तके एक तरफ हुए और बिना इन्द्रियोंको उनके कामोंसे रोके—ध्यान लंग ही नहीं सकता। ध्यान करने वाला न शरीरको हिलावे और न किसी तरफ देखे। अगर किसी तरफ भयानक शब्द हो या कोई जीव काटे, तोभी ध्यानीका ध्यान न टूटना चाहिये। आजकल अधिकांश कर्मकाण्डी गोमुखीमें हाथ चलाते जाते हैं और मनमें अनेक गढ़न्त गढ़ते जाते हैं। कोई कुछ कहता है, तो उसकी भी सुन लेते हैं। ऐसी ईश्वरउपासनासे क्या लाभ?
एक गोपीका कृष्णमें आदर्श प्रेम।
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एक बार एक गोपी यशोदाके घर दीपक जलाने आई। वहाँ दृष्ण खेल रहे थे। वह दृष्णके प्रेममें ऐसी पगी कि, उसने वतीके बजाय अपनी उँगली दीपक पर लगा दी। यहाँ तक कि सारी उ गली जल गई, पर उसे खबर न हुई; किसी दूसरेने उसे चेत कराया तो चेत हुआ।
एक नमाज़ी मियँाको एक कुलटाका उपदेश।
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इसी तरह, एक मियँा जी भी ज्ञानमाज़ बिछा कर नमाज़