वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हमहूँ जरजर देह ; निकट ही दीसत मरिबो !
जैसे सरिता-तीर-वृक्ष को, तुच्छ उखरिबो ।
अजहूँ नहिँ छाँड़त मोह मन, उमग-उमग उरभो रहत ।
ऐसे अचेतके संग सों, न्याय जगत को दुख सहत । ३८॥
38. Those with whom we were born have long ere this passed away from this world. Those with whom we grew up have also shared the similar fate. Our condition now is like that of the trees growing on a sandy river-bank which are gradually crumbling away from day to day.
यज्ञानेके कचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यैको
यज्ञाप्येकस्तदुख बहवस्तल चान्ते न चैकः ॥
इत्थं चेभ्यो रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाचौ
कालः काल्या सह बहुकलः कीडति प्राणिशरैः ॥३६॥
जिस घरमें पहले अनेक लोग थे, उसमें अब एक ही रह गया है । जिस घरमें एक था, उसमें अनेक हो गये, पर अन्तमें एक भी न रहा । इससे मालूम होता है, कि काल देवता, अपनी पत्नी कालीके साथ, संसार-रूपी चौपड़में, दिन-रात-रूपी पासोंको लुढ़का-लुढ़का कर और इस जगत्के प्राणियोंकी गोटी बना-बना कर, खेले रहा है ॥३६॥
मरिबो=मरना ; मरैत । सरिता=नदी । तीर=किनारा । अजहूँ=अब तक । उरभो=फस ।