वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२८ )
जिस घरमें पहले पुत्र, पौत्र, पुत्र-बधू, पौत्र-बधू, पुत्री, दो-हिते और दोहिती प्रभृति अनेक लोग थे, आज वह सुतासा हो गया है, उसमें आज एक ही आदमी नज़र आता है। जिस घरमें पहले एक आदमी था, उसका कुटुम्ब इतना बढ़ा कि सैकड़ों हो गये; पर आज देखते हैं, उसमें एक भी नहीं है। घर का ताला लगा है, भीतर लम्बी-लम्बी घास उग आई है, दीवारें गिर रही हैं, छतें चू रही हैं और ईंटे दाँत दिखा रही हैं। अब उस घरमें चमगीदड़, उलू, साँप और बिच्छू प्रभृति रहते हैं। महात्मा कबीर कहते हैं—
दोहा
ऊँचा महल चिनाइया, सुवरन कली बुलाय । ते मन्दिर खाली परे, रहे मसाना जाय ॥ मलमल खासा पहरते, खाते नागर पान । टेढ़े होकर चालते, करते बहुत गुमान । महलन माँही पौढ़ते, परिसल अंग लगाय । ते सुपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥
जिनहोने ऊँचे-उच्चे महल चिनवाये थे और उनमें सुनहरी काम कराये थे, वे आज श्रमशालनमें चले गये हैं और उनके
घरनकली=घनहरी कली-चना। बुलाय=मँगा कर। ते=वे। मन्दिर=महल। मसाना=श्रमशालन। गुमान=घमण्ड। पौढ़ते=सोते। परिसल=कुष। दीसे=दीखे।