भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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को ही आस्था होती है। वही भोगों को सुख-रूप समझ कर उनकी तृष्णा करता और अपने तर्ज बन्धन में फँसाता है। ज्ञानी पुरुष इस संसारको मिथ्या और सार-हीन तथा नाश-मान समझता है। वह तो केवल ब्रह्मको नित्य और अविनाशी समझ कर उसमें मग्न रहता है।

दोहा ।

नृपति सैन जम्मति सचिव, सुत कलव परिवार ।

करत सबन को स्वम-सम, नमो काल करतार ॥३७॥

37. How painful, alas ! O brother, is the fate of that great king, who was surrounded on all sides by his dependent chieftains who had such a brilliant court, such handsome women, such a host of haughty princes and such bards and story-tellers ! Let us bow before the all-powerful Time through whose influence all those have now passed into oblivion.

वयं येभ्यो जाताश्रिरपरिगता एव खलुते

समं चैः संदृद्धाः स्मृतिविषयतां तेषपि गमिताः ॥

इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासत्रपतना-

द्वतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतश्चभिः ॥३८॥

नृपति=राजा। सचिव=मंत्री। सुत=बेटा। कलव=छी। स्वम-सर=छपनेके समान। नमो=नमस्कार करता हूँ। काल-करतार=विद्याता-काल।