भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कोई भी चीज़ सदा न रहेगी। एक दिन अपनी-अपनी बारी आने से सभीका नाश होगा। इसी विषयमें महाकवि दांग कहते हैं—

है ज्वाल आमदा अज्जा, आफ़रीनशके तमाम ।

महर गर्दू है, चिरागे रहगुजारे बाद यैं।।

संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, सभी नाशमान् हैं। जिसे सूर्य कहते हैं, वह भी एक ऐसा चिराग—दीपक है, जो हवा के सामने रक्खा हुआ है और “अब बुझा-अब-बुझा” हो रहा है; तब औरोंकी तो बात ही क्या? इस संसारकी यही दशा है।

ये अनन्त जल-राशिपूर्ण महासागर और सुमेरु तथा हिमालय प्रभृति पर्वत भी एक दिन कालके कराल-गालमें समा जायेंगे। देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, जल और पवन इन सबको भीकाल खा जायगा। यम, कुबेर, वरुण और इन्द्रादिक महातेजस्वी देव भी एक दिन गिर पड़ेंगे। स्थिर ध्रुव भी अस्थिर हो जायगा। अमृतमय चन्द्रमा और महाप्रकाशमान सूर्य ये दोनों भी नष्ट हो जायेंगे। जगत्के अधिष्ठाता ईश्वर, परमेश्वी ब्रह्मा और महाभैरव-रूप इन्द्रका भी अभाव हो जायगा; तब संसारके साधारण प्राणियोंकी कौन गिन्ती है? एक दिन इस जगत्का ही अस्तित्व नहीं रहेगा, तब और किस की आस्था की जाय? यह जगत् ही भ्रममात्र है। इसमें अज्ञानी