वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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एक-से-एक बुद्धिमान मन्त्री, चारण, भाट और विदूषक प्रभृति थे। एक दिन ये सब थे ; पर आज न वह राजा है, न राजनगरी है, न राजसभा है, न वह चतुरङ्गिणी सेना है, न वे गुरुसामन्त हैं और न वे विधुवदनी मोहिनी स्त्रियाँ ही हैं ! वे सब कहाँ गये ? उन सब को काल खागया ! आज उनका नाम-निशान भी संसारमें नहीं है ! ओह ! जो काल ऐसा बली है, जिसने उन सब को स्वप्नवत् कर दिया, मैं उस बली काल को ही नमस्कार करता हूँ । महात्मा कबीरदास कहते हैं :—
सातों शब्दज बाजते, घर घर-होते राग । ते मन्दिर खाली परे, बैठन लागे काग ॥ परदा रहती पद्मिनी, करती कुलकी कान । बड़ी जु पहुँची कालकी, डेरा हुआ मैदान ॥
जन मकानोंमें पहले तरह-तरहके बाजे बजते और गाने गाये जाते थे, वे आज खाली पड़े हैं। अब उन पर कन्वे बैठते हैं।
जो पद्मिनी पहले परदेमें रहती थी और कुलकी कान के मारे बाहर न निकलती थी, उसीका आज काल के आने से मैदानमें डेरा हो गया है ; यानी सबके सामने मरघट में पड़ी है।
निश्चय ही संसार अनित्य और नाशमान् है। इस जगत्की