वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२१ )
36, For the sake of prolonging our life-breath which is as restless as the drops of water lying on a lotus-leaf, what measures were left undone by us even discarding all discrimination between right and wrong ? So much so that we had to indulge in the sin of shameless self-praise in the presence of wealthy men whose mind is filled with extreme vanity and unscrupulousness.
आतः कष्टमहो महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च
तत्पारवं तस्य च साऽपि राजपरिषत्ताश्रन्दविभ्राननाः ॥
उद्गितः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः
सर्वं यस्य वशादगात्समुत्पिण्डं कालाय तस्मै नमः ॥ ३७
ऐ भाई ! कैसे कष्ट की बात है ! पहले यहाँ कैसा राजा राज करता था, उसकी सेना कैसी थी, उसके राजपुत्रोंका समूह कैसा था, उसकी राजसभा कैसी थी, उसके यहाँ कैसी-कैसी चन्द्रनानां स्त्रियाँ थीं, कैसे अच्छे-अच्छे चारण-भाट और कहानी कहनेवाले उसके यहाँ थे ! वे सब जिस कालके वश हो गये, उसी कालको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३७ ॥
कोई शङ्खस किसी प्रतापी राजाकी राजनगरीको ऊजड़ देख कर शोक करता और कहता है कि, यहाँ का राजा बड़ा जुबर्दस्त था । उसके पास अनगिन्ती सेना थी, उसके पास अच्छे-अच्छे शूर-सामन्त थे, उसके बड़े-बड़े शूरवीर राजपुत्र थे, उसके यहाँ चन्द्रमा को भी लजानेवाली स्त्रियाँ थीं, उसकी राजसभा इन्द्रकी सभाको भी मात करती थी, उसकी सभामें