भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १२४ )

महात्मा सुन्दर दासने भी कहा है :—

सर्प डसे, सु नहीं कछु तालक ;

बीछु लगे, सु भले करि मानौ ॥

सिंह हु खाय, तु नाहिँ कछु डर ;

जो गज मारत, तौ नहिं हानौ ॥

आगि जरी, जल बूढ़ि मेरा, गिरि

जाइ गिरी ; कछु भै मत आनौ ॥

“सुन्दर” और भले सब ही यह ;

दुर्जन-संग भलो जिन जानौ ॥

सुन्दरदासजी कहते हैं, अगर आपको साँप डसे, बिच्छू काटे और हाथी मारे तो कुछ हज मत समझो। आगमें जलने, जलमें डूबने और पहाड़से गिरनेमें भी कोई हानि न समझो, ये सब भले हैं—इनसे हानि नहीं ; हानि और खतरा है दुष्टकी संगतिमें, इसलिये दुर्जनकी सुहबत मत करो। उसकी संगति अच्छी नहीं ; पर आजकल दुष्टोंकी बहुतायत है ; कदम-कदम पर दुर्जनोंके दर्शन होते हैं। इसलिये संसारसे दुःखित और उदासान

सप डसे=साँप काटे। कछु तालक=कुछ चिन्ता। बीछु=बिच्छू। लगे=काटे। भलो करि मानौ=अच्छा समझो। सिंह हु=सिंह भी, और भी। तु=तो। गज=हाथी। हानौ=हानि=नुकसान। आगि= आग। जरी=जलो। बूढ़ि मेरा=डूब मेरा। गिरि=पड़त। भ= भय, डर। आना=समझो। जिन=मत।