भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ११३ )

रहिए अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो ।

हमसखुन कोई न हो, और हमजवों कोई न हो ॥ १ ॥

वे दूरो दीवार सा, इक घर बनाना चाहिए ।

कोई हमसाथा न हो, और पासवों कोई न हो ॥ २ ॥

पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार ।

और अगर भर जाइए, तो नोहावों कोई न हो ॥ ३ ॥

संसारमें जरा भी सुख नहीं है, सर्वत्र भय-ही-भय है । एक को एक खानेको दौड़ता है । जिसे देखो वही जला मरता है । यहाँ ईर्षा-द्वेषका बाजार जोरोंसे गर्म रहता है, इस वास्ते ऐसी जगहमें चलकर रहना चाहिये, जहाँ कोई न हो ; हमारी बात कोई न समझे और हम किसीकी न समझे । मकान भी ऐसा ही हो, जिसमें दरवाजे और दीवार न हों ; अर्थात् साफ जड़ल हो । न हमारा कोई साथी हो, न पड़ोसी ; अगर बीमार हो जायँ, तो कोई खबर लेनेवाला और तीमारदारी या सेवा-शुश्रूषा करनेवाला न हो । अगर सौभाग्यसे भर जायँ, तो कोई शोक करनेवाला भी न हो ।

हमसखुन=हम-जैसा कलाम कहने वाला । हमजवों=हमारी भाषा बोलने वाला । दर=द्वार, दरवाजा । दूरो=दूर+ओ=दूरवाजा और । दीवार=भीत । हमसाथा=पड़ोसी । पासवों=साथ रहने वाला । गर=अगर । तीमारदार=सेवा-दृष्टि करनेवाला । नोहावों=शोक करने वाला, रोनेवाला ।