भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहनेमें अपतिष्ठा और दीनताका भय रहता है, क्योंकि सुषुप्त रहने वालेको सभी दीन-हीन समझ लेते हैं। संश्राममें शत्रुओं का भय रहता है। यदि सूरत सुन्दर होती है, तो सूरतके बिगड़ जानेका भय रहता है; बुढ़ापेमें रूप-रङ्ग नष्ट हो ही जाता है। शास्त्रोंके जानने वालेको प्रतिपक्षियोंका भय रहता है, क्योंकि प्रतिपक्षी सदा उसे नीचा दिखाना और उसका अपमान करना चाहते हैं। पुण्य या सद्गुणोंमें दुष्टोंका भय रहता है; दुष्ट लोग अच्छे-से-अच्छे कामोंमें दोष निकाल कर, उनका उद्घाटन अर्थ लगाने लगते हैं; वे निन्दा या अपवाद करके गुणीके गुणोंका मूल्य घटानेकी भरपूर चेष्टा किया करते हैं। शरीरको मृत्युका भय रहता है, क्योंकि कायाका नाश अवश्यभूामी है। जो शरीरमें आया है, जिसने यह शरीर रूपी वस्त्र पहना है; उसे अपना शरीर छोड़ना ही होगा—यह चोला बदलना और नया पहनना ही होगा।

इस तरह विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि मनुष्य को सांसारिक सभी पदार्थोंमें भय-ही-भय है। फिर भय किसमें नहीं है? केवल “वैराग्य या त्याग अथवा संन्यास” ही ऐसा है, जिसमें किसी भी बातका भय नहीं है।

यों तो संसारमें जरा भी सुख नहीं—सर्वत्र भय-ही-भय है; पर दुष्ट और नीचोंका भय सबसे भारी है। दुष्टोंसे तंग होकर ही, महाकवि गालिब आदमियोंको वस्तीमें भी बसना पसन्द नहीं करते और कहते हैं:—

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