भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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भोगे रोगभयं कुलेच्छुतिभयं विते नृपालाङ्गयम् मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणैः खलभयं काये कृताताङ्गयं सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यभेवाभयम् ॥३५॥

विषयेके भोगनेमें रोगोंका डर है, कुलमें दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, चुप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, शास्त्रोंमें विपत्तियोंके बाद का भय है, गुणोंमें दुष्टोंका भय है, शरीरमें मौतका भय है ; संसारकी सभी चीजोंमें मनुष्योंके भय है । केवल “वैराग्य”में किसी प्रकारका भय नहीं है ॥३५॥

यदि मनुष्य विषय-सुखोंको भोगता है, तो उसे रोगोंका भय रहता है । यदि चन्द्रन आदि शीतल पदार्थोंका लेपन किया जाता है, तो बाढ़ी हो जाती है । यदि स्त्रीसे मैथुन किया जाता है, तो बल घटता है और बहुत करनेसे क्षय रोग हो जाता है । यदि उच्च कुलमें जन्म होता है, तो सदा उसके पतन या उसमें कोई दोष होनेका डर लगा रहता है, क्योंकि कुलमें किसीके भी दुराचारी होनेसे कुलका नाम बदनाम हो जाता है अथवा प्लोग वगैरःके होनेसे कुलका नाम डूब ही जाता है । इसी तरह अधिक धन होनेसे राजाका डर लगा रहता है, कि कहीं राजा सारा धन न छीन ले । चुप