वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( १११ )
भोगे रोगभयं कुलेच्छुतिभयं विते नृपालाङ्गयम् मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणैः खलभयं काये कृताताङ्गयं सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यभेवाभयम् ॥३५॥
विषयेके भोगनेमें रोगोंका डर है, कुलमें दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, चुप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, शास्त्रोंमें विपत्तियोंके बाद का भय है, गुणोंमें दुष्टोंका भय है, शरीरमें मौतका भय है ; संसारकी सभी चीजोंमें मनुष्योंके भय है । केवल “वैराग्य”में किसी प्रकारका भय नहीं है ॥३५॥
यदि मनुष्य विषय-सुखोंको भोगता है, तो उसे रोगोंका भय रहता है । यदि चन्द्रन आदि शीतल पदार्थोंका लेपन किया जाता है, तो बाढ़ी हो जाती है । यदि स्त्रीसे मैथुन किया जाता है, तो बल घटता है और बहुत करनेसे क्षय रोग हो जाता है । यदि उच्च कुलमें जन्म होता है, तो सदा उसके पतन या उसमें कोई दोष होनेका डर लगा रहता है, क्योंकि कुलमें किसीके भी दुराचारी होनेसे कुलका नाम बदनाम हो जाता है अथवा प्लोग वगैरःके होनेसे कुलका नाम डूब ही जाता है । इसी तरह अधिक धन होनेसे राजाका डर लगा रहता है, कि कहीं राजा सारा धन न छीन ले । चुप
( ११२ )
रहनेमें अपतिष्ठा और दीनताका भय रहता है, क्योंकि सुषुप्त रहने वालेको सभी दीन-हीन समझ लेते हैं। संश्राममें शत्रुओं का भय रहता है। यदि सूरत सुन्दर होती है, तो सूरतके बिगड़ जानेका भय रहता है; बुढ़ापेमें रूप-रङ्ग नष्ट हो ही जाता है। शास्त्रोंके जानने वालेको प्रतिपक्षियोंका भय रहता है, क्योंकि प्रतिपक्षी सदा उसे नीचा दिखाना और उसका अपमान करना चाहते हैं। पुण्य या सद्गुणोंमें दुष्टोंका भय रहता है; दुष्ट लोग अच्छे-से-अच्छे कामोंमें दोष निकाल कर, उनका उद्घाटन अर्थ लगाने लगते हैं; वे निन्दा या अपवाद करके गुणीके गुणोंका मूल्य घटानेकी भरपूर चेष्टा किया करते हैं। शरीरको मृत्युका भय रहता है, क्योंकि कायाका नाश अवश्यभूामी है। जो शरीरमें आया है, जिसने यह शरीर रूपी वस्त्र पहना है; उसे अपना शरीर छोड़ना ही होगा—यह चोला बदलना और नया पहनना ही होगा।
इस तरह विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि मनुष्य को सांसारिक सभी पदार्थोंमें भय-ही-भय है। फिर भय किसमें नहीं है? केवल “वैराग्य या त्याग अथवा संन्यास” ही ऐसा है, जिसमें किसी भी बातका भय नहीं है।
यों तो संसारमें जरा भी सुख नहीं—सर्वत्र भय-ही-भय है; पर दुष्ट और नीचोंका भय सबसे भारी है। दुष्टोंसे तंग होकर ही, महाकवि गालिब आदमियोंको वस्तीमें भी बसना पसन्द नहीं करते और कहते हैं:—
( ११३ )
रहिए अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो ।
हमसखुन कोई न हो, और हमजवों कोई न हो ॥ १ ॥
वे दूरो दीवार सा, इक घर बनाना चाहिए ।
कोई हमसाथा न हो, और पासवों कोई न हो ॥ २ ॥
पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार ।
और अगर भर जाइए, तो नोहावों कोई न हो ॥ ३ ॥
संसारमें जरा भी सुख नहीं है, सर्वत्र भय-ही-भय है । एक को एक खानेको दौड़ता है । जिसे देखो वही जला मरता है । यहाँ ईर्षा-द्वेषका बाजार जोरोंसे गर्म रहता है, इस वास्ते ऐसी जगहमें चलकर रहना चाहिये, जहाँ कोई न हो ; हमारी बात कोई न समझे और हम किसीकी न समझे । मकान भी ऐसा ही हो, जिसमें दरवाजे और दीवार न हों ; अर्थात् साफ जड़ल हो । न हमारा कोई साथी हो, न पड़ोसी ; अगर बीमार हो जायँ, तो कोई खबर लेनेवाला और तीमारदारी या सेवा-शुश्रूषा करनेवाला न हो । अगर सौभाग्यसे भर जायँ, तो कोई शोक करनेवाला भी न हो ।
हमसखुन=हम-जैसा कलाम कहने वाला । हमजवों=हमारी भाषा बोलने वाला । दर=द्वार, दरवाजा । दूरो=दूर+ओ=दूरवाजा और । दीवार=भीत । हमसाथा=पड़ोसी । पासवों=साथ रहने वाला । गर=अगर । तीमारदार=सेवा-दृष्टि करनेवाला । नोहावों=शोक करने वाला, रोनेवाला ।
८
( १२४ )
महात्मा सुन्दर दासने भी कहा है :—
सर्प डसे, सु नहीं कछु तालक ;
बीछु लगे, सु भले करि मानौ ॥
सिंह हु खाय, तु नाहिँ कछु डर ;
जो गज मारत, तौ नहिं हानौ ॥
आगि जरी, जल बूढ़ि मेरा, गिरि
जाइ गिरी ; कछु भै मत आनौ ॥
“सुन्दर” और भले सब ही यह ;
दुर्जन-संग भलो जिन जानौ ॥
सुन्दरदासजी कहते हैं, अगर आपको साँप डसे, बिच्छू काटे और हाथी मारे तो कुछ हज मत समझो। आगमें जलने, जलमें डूबने और पहाड़से गिरनेमें भी कोई हानि न समझो, ये सब भले हैं—इनसे हानि नहीं ; हानि और खतरा है दुष्टकी संगतिमें, इसलिये दुर्जनकी सुहबत मत करो। उसकी संगति अच्छी नहीं ; पर आजकल दुष्टोंकी बहुतायत है ; कदम-कदम पर दुर्जनोंके दर्शन होते हैं। इसलिये संसारसे दुःखित और उदासान
सप डसे=साँप काटे। कछु तालक=कुछ चिन्ता। बीछु=बिच्छू। लगे=काटे। भलो करि मानौ=अच्छा समझो। सिंह हु=सिंह भी, और भी। तु=तो। गज=हाथी। हानौ=हानि=नुकसान। आगि= आग। जरी=जलो। बूढ़ि मेरा=डूब मेरा। गिरि=पड़त। भ= भय, डर। आना=समझो। जिन=मत।
( ११५ )
मनुष्यके लिए वनमें जाकर रहनेमें ही शान्ति है। इत-पंक्तियोंके लेखकको भी, जो अनेक बार ऐसा ही चाहते लगता है, इस संसारसे दिल लगाना—इसमें रहना, अच्छा नहीं मालूम होता ; पर, बकौल उस्ताद ज़ौक, कुछ मजबूरी ऐसी आ पड़ती है, कि सरता नहीं। आपने फरमाया है,—
बेहतर तो है यहीं, कि न दुनियासे दिल लगे ।
पर क्या करें, जो काम न बे-दिल्ली चले ॥
संसारसे दिल लगाना अच्छा नहीं ; पर क्या करें, बिना दिल लगाये चलता भी तो नहीं ।
सारांश यह है कि, यदि सख्की सुख-शान्ति चाहते हो ; तो खी-पुत्र, धन-दौलत और ज़मीन-जायदादकी ममता छोड़ कर वैराग्य ले लो ; यानी इन सबको छोड़कर वनमें जा बसो और एक मात्र परमात्मामें मन लगाओ। संसारको त्यागनेके सिवा, सुखकी और राह नहीं। हमने अनेक बार संसार त्यागनेका इरादा किया, पर हमारे अज्ञानी मनने हमें ऐसा करनेसे बारम्बार रोका। हम मनकी बातोंको विचारके कंटि पर तोलते रहे। अब हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि, मनकी सलाह ठीक नहीं। हमारा गन्दा मन हमें शैतानकी तरह गुमराह कर रहा है। जिस सुखकी खोजमें हमने ५१ वर्ष
बेहतर=भला। न दुनियासे दिल लगे=जगज्जालमें मन न फंसे ; दुनियादारीमें न फंसे। बे-दिल्ली=बिना दिल लगाये ॥
( १३६ )
योंही गवा दिये, उस सुखका लेश भी हमें न मिला। इस जगत्में, हमें सदा शोक-तापोंसे जलना पड़ा। हमारी सुबुद्धि हमसे कह रही है कि, शौतानके भरमानेमें मत आओ। जो ऊकरी काम करने हैं, उन्हें जल्दी-से-जल्दी निपटा कर, सबको तबाह बनको चले जाओ और मनको शुद्ध करके परमात्मा में लगाओ। दैर न करो; कहीं ऐसा न हो कि, तुम अपने काम ही निपटाते रहो और काल आ पहुँचे; और तुम्हारे मनकी मनमें रह जाय। मनकी राह पर न चलो, बल्कि मनको अपनी राह पर चलाओ। “सच्चा सुख वैराग्यमें ही है” इस महावाक्यको क्षणभर भी न भूलो।
व्यप्य ।
बहुत भोगको संग, तहाँ इन रोगनको डर ।
धनहूँ को डर भूप, अग्नि अरु त्योहीं तस्कर ।
सेवामें भय स्वामि, समरमें शत्रुनको भय ।
कुलहमें भय नारि, देहको काल करत ज्ञय ।
अभिमान डरत अपमान सों, गुन डरपत सुन खल-शबद ।
सब गिरत परत भयसों भरे, अभय एक “वैराग्यपद” ॥ ३५ ॥
35. In the enjoyment of pleasure there is always the fear of disease. Membership in a high family is accompanied by thy fear
भूप=राजा। तस्कर=चोर। स्वामि=मालिक। समर=लड़ाई।
नारि=ब्री, करन ज्ञय=नाश करता है। अभय=निर्भयता।
( ११० )
of the latter's downfall. Wealth is ever haunted by the fear of kings. Silence is associated with the fear of neglect and dishonour. In strength there is the fear of enemies. A handsome appearance is always in fear of being disfigured in old age. Learning and science have the fear of antagonistic discussions. Good qualities suffer from the fear of evil-minded persons, who will do their best to lower the value of a man possessed of them by slander etc. The body is beset with the fear of death. Thus everything in this world pertaining to man is associated with fear. Renunciation alone is free from such associations.
अमीषां प्राणानां तुलितविस्मिनीपत्रपयसां
छते किं नास्माभिर्विगलितविवेकैर्व्यवसितम् ॥
यदाव्यानामघे द्रविणमदनःशंकमनसां
कर्तुं वीतब्रीहेर्निजगुणकथापातकमपि ॥ ३६ ॥
कमल-पत्र पर जलकी बूँदोंके समान चञ्चल प्राणोंके लिए; हमने घुरे और भलेका विचार न करके, क्या-क्या काम नहीं किये ? हमने धन-मदसे मतवाले लोगोंके सामने निर्लज्ज होकर अपने गुणोंके कीर्तन करनेका पाप तक किया ॥ ३६ ॥
अथवा—
कमलके पत्तेपर ठहरी हुई जलकी बूँदके समान क्षणभङ्गुर प्राणोंके लिये ; मूर्खातावश, धनमदसे निःशंक धनी मनुष्योंके सामने, बेहया होकर, अपनी तारीफ़ आप करनेका घोर पाप करनेवाले हमलेगोनें कौनसा पाप नहीं किया ?
( ११८ )
कहने वाला कहता है कि इस जीवनके लिए, जो नितान्त क्षणभंगुर है, जिसकी स्थिरता कुछ भी नहीं है, मैंने कोई उपाय—कोई उद्यम उठा न रक्खा। और तो और ; इस शुद्ध जीवनके लिए, अपनी तारीफ आप करनेका महापातक भी मैंने किया ; और वह भी ऐसे लोगोंके सामने, जो धनके मद से मतवाले हो रहे थे और जो किसी की ओर आँख उठाकर भी न देखते थे। हाय ! ये सब अकर्म करने पर भी मेरा मनोरथ सिद्ध न हुआ !
संसारमें अपने गुणोंका आप बखान करना—बड़ा भारी पाप समझा जाता है। आत्मश्लाघा या आत्मप्रशंसा वास्तवमें बहुत ही बुरी है। जिसने आत्मश्लाघा की, उसने कौनसा पाप नहीं किया ? इसीसे कोई भी बुद्धिमान ऐसा नहीं करता ; परन्तु ऊहरत इस पापको भी करा लेती है। जब किसी तरह कोई काम नहीं होता, कोई और तारीफ करनेवाला नहीं मिलता ; तब मनुष्य, क्षणस्थायी जीवनके लिए, इस निन्द्य-कर्मको भी करता है।
जीवन क्षणभंगुर है।
यह प्राण उसी तरह चञ्चल हैं, जिस तरह कमलके पत्ते पर पानीकी बूँद। यह जीवन बादलकी छाया, बिजलीकी चमक और पानीके बूबूलेकी तरह है। जीवनकी चंचलता पर महात्मा कबीर कहते हैं :—
( ११६ )
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुसकी जात ।
देखत ही क्षिप्र जायगा, ज्यों तारा परभात ॥
“कविरा” पानी होँजका, देखत गया बिलाय ।
ऐसे जियरा जायगा, दिन दश ढीली लाय ॥
मनुष्य पानीके बुलबुलेकी तरह है । जिस तरह पानीका बुलबुला उठता और क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है ; उसी तरह आदमी पैदा होता और क्षण-भरमें ही नष्ट हो जाता है । यह मनुष्य उसी तरह अदृश्य हो जायगा, जिस तरह सवेरेका तारा देखते-देखते गायब हो जाता है ।
कबीरदास कहते हैं, जिस तरह देखते-देखते होँजका पानी, मोरीकी राहसे निकल कर, बिलाय जाता है ; उसी तरह यह जीवात्मा देहसे निकल जायगा ; दस-पाँच दिनको देर समझिये ।
महात्मा शङ्कराचार्य जी ने भी कहा है :—
“नलिनीदलगत जलमतितरलम् ।
तद्रज्जीवनमतिशय चपलम् ॥”
“यह जीवन कमल-पत्र पर पड़े हुए जलकी तरह वञ्छल है ।”
ऐसे वञ्छल जीवनके लिये अज्ञानी मनुष्य नीच-से-नीच कर्म करनेमें संकोच नहीं करता,—यह बड़ी ही लज्जाकी बात
बुदबुदा=बबुला । मानुस=आदमी । परभात=सवेरा । जियरा=जीव ।
( १२० )
है। अगर मनुष्यको हज़ारों-लाखों बरसकी उम्र मिलती अथवा सही काकभुशण्ड होते; तो न जाने मनुष्य क्या-क्या पाप कर्म न करता? बड़े ही नीच हैं, जो इस चन्द्ररोज़ा जिन्दगीके लिए, तरह-तरहके पापोंकी गठरी बाँधकर, अपना लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। मनुष्यो! आँखें खोलकर देखो और कान देकर सुनो! मिट्टी और पत्थर अथवा लकड़ी वगैरः की बनी चीज़ोंकी कुछ उम्र है; पर तुम्हारी उम्र कुछ भी नहीं। अतः इस क्षणस्थायी जीवनमें पाप-कर्म न करो।
कुण्डलिया ।
जैसे पंकजपत्र पर, जल चंचल ढरि जात ।
त्यौही चंचल आगहू, तजि जैहं निज गात ।
तजि जैहं निज गात, बात यह नीके जानत ।
तोहु ढँाडि विवेक, नृपनकी सेवा ढानत ।
निज गुन करत बखान, निलजता उधरी ऐसे ।
भूल गयो सतज्ञान, मूढ अज्ञानी जैसे ॥३६॥
पंकज पत्र = कमलका पत्ता । ढरि जात = ढलक जाता है । त्यौही = उसी तरह । तजि जैहं = छोड़ जायेंगे । निज गात = अपना शरीर । नीके = अच्छी तरह । विवेक = विचार । सेवा ढानत = चाकरी करता है । निज गुन करत बखान = अपने गुण ब्याप गाता है । सतज्ञान = असल ज्ञान, सच्चा ज्ञान ।
A high-contrast, black and white photograph of a blank page from a book. The page is held open by a hand, with the thumb and part of the palm visible on the right side. The page itself is mostly white with some minor blemishes and a few small dark spots. The background is dark, and the lighting is very bright, creating a stark contrast between the white page and the dark surroundings.
वैराग्य शतक
हे भाई ! कैम कष्ट की बात है ! पहले यहाँ कैसा राजा राज करता था, उसकी राजसभा कैसी थी, उसके यहाँ कैसे- कैसे शूर सामन्त और सेना एवं चन्द्रानना स्त्रियों थीं, पर आज सब सूना है ! सबको काल खा गया !! पृ० ११५
( १२१ )
36, For the sake of prolonging our life-breath which is as restless as the drops of water lying on a lotus-leaf, what measures were left undone by us even discarding all discrimination between right and wrong ? So much so that we had to indulge in the sin of shameless self-praise in the presence of wealthy men whose mind is filled with extreme vanity and unscrupulousness.
आतः कष्टमहो महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च
तत्पारवं तस्य च साऽपि राजपरिषत्ताश्रन्दविभ्राननाः ॥
उद्गितः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथाः
सर्वं यस्य वशादगात्समुत्पिण्डं कालाय तस्मै नमः ॥ ३७
ऐ भाई ! कैसे कष्ट की बात है ! पहले यहाँ कैसा राजा राज करता था, उसकी सेना कैसी थी, उसके राजपुत्रोंका समूह कैसा था, उसकी राजसभा कैसी थी, उसके यहाँ कैसी-कैसी चन्द्रनानां स्त्रियाँ थीं, कैसे अच्छे-अच्छे चारण-भाट और कहानी कहनेवाले उसके यहाँ थे ! वे सब जिस कालके वश हो गये, उसी कालको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३७ ॥
कोई शङ्खस किसी प्रतापी राजाकी राजनगरीको ऊजड़ देख कर शोक करता और कहता है कि, यहाँ का राजा बड़ा जुबर्दस्त था । उसके पास अनगिन्ती सेना थी, उसके पास अच्छे-अच्छे शूर-सामन्त थे, उसके बड़े-बड़े शूरवीर राजपुत्र थे, उसके यहाँ चन्द्रमा को भी लजानेवाली स्त्रियाँ थीं, उसकी राजसभा इन्द्रकी सभाको भी मात करती थी, उसकी सभामें
( १२२ )
एक-से-एक बुद्धिमान मन्त्री, चारण, भाट और विदूषक प्रभृति थे। एक दिन ये सब थे ; पर आज न वह राजा है, न राजनगरी है, न राजसभा है, न वह चतुरङ्गिणी सेना है, न वे गुरुसामन्त हैं और न वे विधुवदनी मोहिनी स्त्रियाँ ही हैं ! वे सब कहाँ गये ? उन सब को काल खागया ! आज उनका नाम-निशान भी संसारमें नहीं है ! ओह ! जो काल ऐसा बली है, जिसने उन सब को स्वप्नवत् कर दिया, मैं उस बली काल को ही नमस्कार करता हूँ । महात्मा कबीरदास कहते हैं :—
सातों शब्दज बाजते, घर घर-होते राग । ते मन्दिर खाली परे, बैठन लागे काग ॥ परदा रहती पद्मिनी, करती कुलकी कान । बड़ी जु पहुँची कालकी, डेरा हुआ मैदान ॥
जन मकानोंमें पहले तरह-तरहके बाजे बजते और गाने गाये जाते थे, वे आज खाली पड़े हैं। अब उन पर कन्वे बैठते हैं।
जो पद्मिनी पहले परदेमें रहती थी और कुलकी कान के मारे बाहर न निकलती थी, उसीका आज काल के आने से मैदानमें डेरा हो गया है ; यानी सबके सामने मरघट में पड़ी है।
निश्चय ही संसार अनित्य और नाशमान् है। इस जगत्की
( १२३ )
कोई भी चीज़ सदा न रहेगी। एक दिन अपनी-अपनी बारी आने से सभीका नाश होगा। इसी विषयमें महाकवि दांग कहते हैं—
है ज्वाल आमदा अज्जा, आफ़रीनशके तमाम ।
महर गर्दू है, चिरागे रहगुजारे बाद यैं।।
संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, सभी नाशमान् हैं। जिसे सूर्य कहते हैं, वह भी एक ऐसा चिराग—दीपक है, जो हवा के सामने रक्खा हुआ है और “अब बुझा-अब-बुझा” हो रहा है; तब औरोंकी तो बात ही क्या? इस संसारकी यही दशा है।
ये अनन्त जल-राशिपूर्ण महासागर और सुमेरु तथा हिमालय प्रभृति पर्वत भी एक दिन कालके कराल-गालमें समा जायेंगे। देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, जल और पवन इन सबको भीकाल खा जायगा। यम, कुबेर, वरुण और इन्द्रादिक महातेजस्वी देव भी एक दिन गिर पड़ेंगे। स्थिर ध्रुव भी अस्थिर हो जायगा। अमृतमय चन्द्रमा और महाप्रकाशमान सूर्य ये दोनों भी नष्ट हो जायेंगे। जगत्के अधिष्ठाता ईश्वर, परमेश्वी ब्रह्मा और महाभैरव-रूप इन्द्रका भी अभाव हो जायगा; तब संसारके साधारण प्राणियोंकी कौन गिन्ती है? एक दिन इस जगत्का ही अस्तित्व नहीं रहेगा, तब और किस की आस्था की जाय? यह जगत् ही भ्रममात्र है। इसमें अज्ञानी
( १२४ )
को ही आस्था होती है। वही भोगों को सुख-रूप समझ कर उनकी तृष्णा करता और अपने तर्ज बन्धन में फँसाता है। ज्ञानी पुरुष इस संसारको मिथ्या और सार-हीन तथा नाश-मान समझता है। वह तो केवल ब्रह्मको नित्य और अविनाशी समझ कर उसमें मग्न रहता है।
दोहा ।
नृपति सैन जम्मति सचिव, सुत कलव परिवार ।
करत सबन को स्वम-सम, नमो काल करतार ॥३७॥
37. How painful, alas ! O brother, is the fate of that great king, who was surrounded on all sides by his dependent chieftains who had such a brilliant court, such handsome women, such a host of haughty princes and such bards and story-tellers ! Let us bow before the all-powerful Time through whose influence all those have now passed into oblivion.
वयं येभ्यो जाताश्रिरपरिगता एव खलुते
समं चैः संदृद्धाः स्मृतिविषयतां तेषपि गमिताः ॥
इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासत्रपतना-
द्वतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतश्चभिः ॥३८॥
नृपति=राजा। सचिव=मंत्री। सुत=बेटा। कलव=छी। स्वम-सर=छपनेके समान। नमो=नमस्कार करता हूँ। काल-करतार=विद्याता-काल।
( १२५ )
जिनसे हमने जन्म लिया था, उन्हें इस दुनियासे गये बहुत दिन हो गये ; जिनके साथ हम बड़े हुए थे, वे भी इस दुनियाको छोड़कर चले गये । अब हमारी दशा भी रेतीले नदी-किनारेके बूँदोंकी सी हो रही है, जो दिन-दिन जड़ छोड़ते हुए गिराऊ होते चले जाते हैं ॥२८॥
जिनसे हम पैदा हुए थे, उन्हें इस दुनियासे गये जमाना गुजर गया और जिन लोगोंके साथ हम जन्मे थे अथवा जो लोग हमारे समवयस्क थे, वे भी चल बसे ; जिन लोगोंके साथ हम पले, जिनके साथ हम खेले-कूदे, जिनके साथ हमने कारोबार किया, वे सब भी कालके गालमें समा गये । अब हमारा नम्बर भी आया ही समझिये—अब हम भी चलने ही वाले हैं । दिन-दिन हमारा शरीर क्षीण हुआ जाता है । हमारी दशा अब नदी-तटके बालूमें लगे हुए वृक्षों कीसी है, जिनके गिरने की संभावना हर घड़ी रहती है । हमारी पेसी हालत है, फिर भी आश्चर्य है, कि हमारा माया-मोह नहीं छूटता ! अब भी हमारा मन नहीं समझता और वह संसारी जजालोंसे अलग होना नहीं चाहता ! महात्मा कबीर भी यही कहते हैं । उनकी सुन लीजिये :—
बारी बारी आपनी, चले पियारे मित ।
तेरी बारी जीवरा, नियरे आवे नित ॥
( ३२६ )
माली आवत देखिकै, कलियाँ करी पुकार ।
फूली-फूली जुनि लई, कलह हमारी बार ॥
साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार ।
कागदमें बाकी रही, तारों लागी बार ॥
बारी-बारीसे सभी प्यारे और मित्र चल बसे । अरे जीव ! अब तेरा नम्बर भी नित्य निकट आता-जाता है । मालीको आते देख कर, कलियोंने कहा—फूली-फूली तो आज चुन ली गई, कलह हमारी भी बारी है । हमारे साथी कले रथे अब हम भी चलने वाले हैं । कागजमें यानी खातेमें कुछ साँस बाकी रह गये हैं, इससे देर हो रही है ; यानी अपने श्रेष्ठ साँसों को पूरा करनेके लिए हम उहरे हुए हैं ।
संसारका यही हाल है, रोज ही यह तमाशा देखते हैं ; पर फिर भी हमें होश नहीं होता !
छप्पय ।
जो जन्मे हम संग, उतौ सब स्वर्ग सिधारे ।
जो खेले हम संग, काल तिनहुँ कहँ मारे ।
मिंत=मित्र । जीवरा=हे जीव ! नियरे=नजदीक । नित= नित्य, रोज । बार=बारी । चालनहार=चलने वाले, भरने वाले । बार=देर ॥
उतौ=वे तो । तिनहुँ कह=उनको भी । दीसत=दीखता है ।
( १२७ )
हमहूँ जरजर देह ; निकट ही दीसत मरिबो !
जैसे सरिता-तीर-वृक्ष को, तुच्छ उखरिबो ।
अजहूँ नहिँ छाँड़त मोह मन, उमग-उमग उरभो रहत ।
ऐसे अचेतके संग सों, न्याय जगत को दुख सहत । ३८॥
38. Those with whom we were born have long ere this passed away from this world. Those with whom we grew up have also shared the similar fate. Our condition now is like that of the trees growing on a sandy river-bank which are gradually crumbling away from day to day.
यज्ञानेके कचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यैको
यज्ञाप्येकस्तदुख बहवस्तल चान्ते न चैकः ॥
इत्थं चेभ्यो रजनिदिवसौ दोलयन्द्वाविवाचौ
कालः काल्या सह बहुकलः कीडति प्राणिशरैः ॥३६॥
जिस घरमें पहले अनेक लोग थे, उसमें अब एक ही रह गया है । जिस घरमें एक था, उसमें अनेक हो गये, पर अन्तमें एक भी न रहा । इससे मालूम होता है, कि काल देवता, अपनी पत्नी कालीके साथ, संसार-रूपी चौपड़में, दिन-रात-रूपी पासोंको लुढ़का-लुढ़का कर और इस जगत्के प्राणियोंकी गोटी बना-बना कर, खेले रहा है ॥३६॥
मरिबो=मरना ; मरैत । सरिता=नदी । तीर=किनारा । अजहूँ=अब तक । उरभो=फस ।
( १२८ )
जिस घरमें पहले पुत्र, पौत्र, पुत्र-बधू, पौत्र-बधू, पुत्री, दो-हिते और दोहिती प्रभृति अनेक लोग थे, आज वह सुतासा हो गया है, उसमें आज एक ही आदमी नज़र आता है। जिस घरमें पहले एक आदमी था, उसका कुटुम्ब इतना बढ़ा कि सैकड़ों हो गये; पर आज देखते हैं, उसमें एक भी नहीं है। घर का ताला लगा है, भीतर लम्बी-लम्बी घास उग आई है, दीवारें गिर रही हैं, छतें चू रही हैं और ईंटे दाँत दिखा रही हैं। अब उस घरमें चमगीदड़, उलू, साँप और बिच्छू प्रभृति रहते हैं। महात्मा कबीर कहते हैं—
दोहा
ऊँचा महल चिनाइया, सुवरन कली बुलाय । ते मन्दिर खाली परे, रहे मसाना जाय ॥ मलमल खासा पहरते, खाते नागर पान । टेढ़े होकर चालते, करते बहुत गुमान । महलन माँही पौढ़ते, परिसल अंग लगाय । ते सुपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥
जिनहोने ऊँचे-उच्चे महल चिनवाये थे और उनमें सुनहरी काम कराये थे, वे आज श्रमशालनमें चले गये हैं और उनके
घरनकली=घनहरी कली-चना। बुलाय=मँगा कर। ते=वे। मन्दिर=महल। मसाना=श्रमशालन। गुमान=घमण्ड। पौढ़ते=सोते। परिसल=कुष। दीसे=दीखे।