भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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मनुष्यके लिए वनमें जाकर रहनेमें ही शान्ति है। इत-पंक्तियोंके लेखकको भी, जो अनेक बार ऐसा ही चाहते लगता है, इस संसारसे दिल लगाना—इसमें रहना, अच्छा नहीं मालूम होता ; पर, बकौल उस्ताद ज़ौक, कुछ मजबूरी ऐसी आ पड़ती है, कि सरता नहीं। आपने फरमाया है,—

बेहतर तो है यहीं, कि न दुनियासे दिल लगे ।

पर क्या करें, जो काम न बे-दिल्ली चले ॥

संसारसे दिल लगाना अच्छा नहीं ; पर क्या करें, बिना दिल लगाये चलता भी तो नहीं ।

सारांश यह है कि, यदि सख्की सुख-शान्ति चाहते हो ; तो खी-पुत्र, धन-दौलत और ज़मीन-जायदादकी ममता छोड़ कर वैराग्य ले लो ; यानी इन सबको छोड़कर वनमें जा बसो और एक मात्र परमात्मामें मन लगाओ। संसारको त्यागनेके सिवा, सुखकी और राह नहीं। हमने अनेक बार संसार त्यागनेका इरादा किया, पर हमारे अज्ञानी मनने हमें ऐसा करनेसे बारम्बार रोका। हम मनकी बातोंको विचारके कंटि पर तोलते रहे। अब हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि, मनकी सलाह ठीक नहीं। हमारा गन्दा मन हमें शैतानकी तरह गुमराह कर रहा है। जिस सुखकी खोजमें हमने ५१ वर्ष

बेहतर=भला। न दुनियासे दिल लगे=जगज्जालमें मन न फंसे ; दुनियादारीमें न फंसे। बे-दिल्ली=बिना दिल लगाये ॥

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