वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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योंही गवा दिये, उस सुखका लेश भी हमें न मिला। इस जगत्में, हमें सदा शोक-तापोंसे जलना पड़ा। हमारी सुबुद्धि हमसे कह रही है कि, शौतानके भरमानेमें मत आओ। जो ऊकरी काम करने हैं, उन्हें जल्दी-से-जल्दी निपटा कर, सबको तबाह बनको चले जाओ और मनको शुद्ध करके परमात्मा में लगाओ। दैर न करो; कहीं ऐसा न हो कि, तुम अपने काम ही निपटाते रहो और काल आ पहुँचे; और तुम्हारे मनकी मनमें रह जाय। मनकी राह पर न चलो, बल्कि मनको अपनी राह पर चलाओ। “सच्चा सुख वैराग्यमें ही है” इस महावाक्यको क्षणभर भी न भूलो।
व्यप्य ।
बहुत भोगको संग, तहाँ इन रोगनको डर ।
धनहूँ को डर भूप, अग्नि अरु त्योहीं तस्कर ।
सेवामें भय स्वामि, समरमें शत्रुनको भय ।
कुलहमें भय नारि, देहको काल करत ज्ञय ।
अभिमान डरत अपमान सों, गुन डरपत सुन खल-शबद ।
सब गिरत परत भयसों भरे, अभय एक “वैराग्यपद” ॥ ३५ ॥
35. In the enjoyment of pleasure there is always the fear of disease. Membership in a high family is accompanied by thy fear
भूप=राजा। तस्कर=चोर। स्वामि=मालिक। समर=लड़ाई।
नारि=ब्री, करन ज्ञय=नाश करता है। अभय=निर्भयता।