भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १०१ )

स जातः कोऽप्यासीन्यहनरिपुणा मूर्ध्नि धवलं

कपालं यस्योच्चेर्विनिहितमलंकारविधये ।

तृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिद्भुना

नमस्त्रिः कः पुंसामयमतुलदर्पञ्चरभः ॥२६॥

प्राचीन कालमें ऐसे पुरुष हुए हैं, जिनकी खोपड़ियोंकी माला बनाकर स्वयं शिवने शृंगारके लिये अपने गलेमें पहनी । अब ऐसे लोग हैं, जो अपनी जीविका-निर्वाहके लिये सलाम करने वालोंसे ही प्रतिष्ठा पाकर, अभिमानके ज्वर ( मद ) से गरम हो रहे हैं ॥२६॥

दोहा ।

ऐसेहू जग में भये, मुण्डमाल शिव कीन ।

धनलोभी नर नवत लखि, तुमको मदज्वर दीन ॥२७॥

29. There have been even such great men before, that their skulls were made into a wreath and worn round his neck for the sake of adornment by the great Shiva Himself. What should we think of the boundless vanity of people who become so proud of their position now-a-days even if they are greeted respectfully by a few persons desirous of conducting their living somehow or other ?

अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिराभीरमहे यावदित्यं

शरस्त्वं वादिदर्पञ्चरशमनविधावन्नयं पाटवं नः ।

मुण्डमाल = मुण्डोंकी माला ; खोपड़ियोंकी माला । नवत लखि = कुकते हुए या सलाम करते हुए देखकर ।

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