भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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of battles. These small and narrow-minded kings are waited upon by needy whose mind are always in suspense whether they will be given something or not. Fie on the mean persons who hope to get a little bounty from such givers who are so small and poor in heart themselves.

न नट न विटा न गायना न परद्रेहनिबद्धुद्वयः ।

नृपसम्भनि नास के वयं कुचभारानमिता न योषितः ॥२७॥

न तो हम नट या बाजीगर हैं, न हम नचये-गवये हैं, न हमका जुगलखोरी आती है, न हमें दूसरों की कर्वादी की बन्दिशें बाँधनी आती हैं और न हम स्तनभारावनत खियाँ ही हैं ; फिर हमारी पूछ राजाओंके यहाँ क्यों होने लगी? ॥ २७ ॥

राजाओंके दरबारोंमें नटों, बाजीगरों, नाचने-गाने वालों तथा पराये नाशकों तद्वीरि करनेवालों, जुगलखोरी करनेवालों, इधर-की-उधर लगानेवालों अथवा ऐसी सुन्दरियोंकी पूछ होती है, जो रूपवती हैं और जिनकी कमर उनके स्तनोंके भारसे लची जाती है—हममें इनमेंसे एक भी बात नहीं, फिर हमारा प्रवेश राजसभामें कैसे हो सकता है? वहाँ तो उन्हींकी पूछ है—उन्हींका आदर है—जो उनकी विषय-वासनाएँ पूरी करते हैं।

दोहा ।

नट भट विट गायन नहीं, नाहिं वादिन के माहिं ।

कौन भाँति भूपति मिलन, तरुणी भी हम नाहिं ? ॥२७॥

नट = कलाबाज, नाचनेवाला । भट = योद्धा । विट = कुटना, रोंड