वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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है। यह पृथ्वी मृदा हमारे ही पास रहेगी। पर वे सब एक दिन इसे छोड़कर चलें वसे; यह उनकी न हुई; वे इसे सदा न भोग सकें। तब आजकालके छोटे-छोट राजा, जो अपने तर्ज पृथ्वीपति समझ कर अभिमानके नरोमें चूर रहते हैं, इसके लिये लड़ते हैं, खून-खराबी करते हैं, क्या यह उनकी अज्ञानता नहीं है? उनकी यह छोटी सी प्रभुता—मलिकाई सदा-सर्वदा न रहेगी; यह बिजली कीसी बमक और बादल कीसी छाया है। इस पर घमण्ड करना बड़ी भूलकी बात है। महात्मा कबीर कहते हैं :—
चहुँदिशि पाका कोठ था, मन्दिर नगर मैकार ।
खिरकी-खिरकी पाहर, गज बन्धा दरबार ॥
चहुँदिशि तो योद्धा खड़े, हाथ लिये हथियार ।
सब ही यह तन देखता, काल ले गया मार ॥
आस-पास योद्धा खड़े, सबै बजावे गाल ।
मम्भ महल ते ले चला, ऐसा परवल काल ॥
हे मनुष्य ! मौतसे डर, अभिमान त्याग। किसी राजाकी नगरीके चारों तरफ पक्की शहरपनाह थी, उसका महल शहरके बीचों-बीच था, हरेक फाटककी खिड़की पर पहरेदार थे, दरबारमें हाथी बैधाया, चारों तरफ सुसज्जा सिपाही-हथियार बाँधे हुए खड़े थे। आस-पास खड़े हुए योद्धा गाल बजाते ही रह गये और वह बलवान काल, ऐसा बन्दोबस्त होनेपर भी,