वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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24. If thou art a king, we too are great in our pride of knowledge learnt by serving our teacher. If thou art famous for the power and riches, the poets have proclaimed the fame of our knowledge far and wide. Thus O thou ? who dost not honour anybody, there is not much difference between us both. If thou dost not care to look towards us, we too are absolutely without any desire to court thy attention.
असुक्तार्यां यस्यां ज्ञापपि न यातं नृपयतै-
सुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाप् ।
तदंशस्याप्यंशे तदवयवलेखेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत सुदृष्ट ॥२५॥
सैकड़ों हजारों राजा इस पृथ्वीका अपनी-अपनी कहकर चले गये, पर यह किसी की भी न हुई ; तब राजा लोग इसके स्वामी होनेका वमबड क्यों करते हैं ? दुःखकी बात है, कि छोटे-छोटे राजा छोटे-से-छोटे टुकड़ेके मालिक होकर अभिमानके मारे फ़ले नहीं समाते ! जिस बातसे दुःख होना चाहिये, मूर्ख उससे उल्टे खुश होते हैं ॥२५॥
इस पृथ्वी पर रावण और सहस्रबाहु प्रभृति एक-से-एक बढ़कर राजा हो गये, जिन्होंने त्रिलोकी अपनी अङ्गुली पर नचा डाली । वे कहते थे, कि हमारे बराबर जगत्में दूसरा कोई नहीं
—प्रसिद्ध । इक्वि = उत्तम कवि । निशद्यौस = रातदिन । अन्तर = फर्क । पुतेपर = इतने पर भी । मुखफेर हो = मुँह फेरोगे ।