भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २८ )

27. We are neither jugglers nor dancers or musicians, nor are our minds well-versed in scheming other people's fall. We are not even women walking low with the burden of their breasts. Then what should be our business in the palaces of kings who welcome only such persons as are ready to help them in gratifying their desires ?

पुरा विद्वत्तासीऽदुपशमवतां क्लेशहतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धैष विषयिणाम् । इदानीं तु प्रेक्ष्य चित्तितलसुजः शास्त्रविमुखा नहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनभयोऽथः प्रविशति ॥२८॥

पहले समयोंमें, विद्या केवल उन लोगोंके लिये थी, जो मानसिक क्लेशोंसे छुटकारा पाकर चित्तकी शान्ति चाहते थे। इसके आद विषय-सुख चाहने वालोंके कामकी हुई। अब तो राजा लोग शास्त्रोंको सुनना ही नहीं चाहते; वे उससे पराङ्मुख हो गये हैं; इसलिये वह दिन-ब-दिन रसातल को चली जाती है। यह बड़े ही दुःखकी बात है ! ॥२८॥

पहले जमानेमें, जो विद्या शान्तिकामी लोगोंके अशान्त चित्तोंको शान्त करने, उनकी मनोवेदनाओंको दूर करने और उनको शोक-तापकी आगमें जलनेसे बचानेके काम आती थी,

मिलानेवाला। गायन = गवैया। बादी = चुगलखोर। भूपति = राजा। वस्त्री = जवान शौरत।