वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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दृश्योंको गिराती है। उसमें भँवर कैसे हैं? मोहरूपी भवर हैं। उसके किनारे काहेके हैं? चिन्ताके। उसको कौन पार कर सकते हैं? उसको वही पार कर सकते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जिनके चित्तसे ये सब बलायें हट गयी हैं और जिनका चित्त केवल ब्रह्ममें लीन है।
सारोश,—यदि आनन्द चाहो ; तो आशा, इच्छा, प्रीति, तर्क-वितर्क, मोह और चिन्ता प्रभृतिको एकदम छोड़कर शुद्धचित्त हो जाओ और अपने आत्मा या ब्रह्मके ध्यानमें तन्मय हो जाओ।
वृष्यय ।
नदीरूपं यह आश, मनोरथ पूर रहौ जल । तृष्णा तरल तरंग, राग है ग्राह महाबल । नामा तर्क विहंग, संग धीरज-तरु तोस्त । अमर भयानक मोह, सबद को गहि-गहि बोरत । निरा बहत रहत चित-भूमिमें, चिन्तातट अतिही विकट ।
कदि गये पार योगी पुरुष, उन पायौ सुख तेहि निकट ॥४५॥
45 Hope is just like a river with water in the shape of desires, agitated by currents in the shape of avarice, with alligators in the
पूर रहौ = भर रहा। तृष्णा = इच्छा। तरल = चंचल। तरंग = लहर। राग = प्रेम। ग्राह = मगर, धड़ियाल। महाबल = अत्यन्त बलवान। नामा = तरह तरहके। तर्क = दलील। विहंग = पक्षी। अमर = भोरा।