भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १४६ )

जो कोई अपनी गर्दन ऊँची करता है, वह मुँह के बल गिरता है।

44. Look how the great Ganges has fallen lower and lower from her abode of stupendous elevation ! from the Swarga down on to the head of the God Shiva, from thence to the summit of the mountain, from the mountain to the plain earth and from thence down to the sea. Similar is the fate of men devoid of discriminating reason who undergo a downfall in hundreds of ways.

आशा नाम नदी मनोरथजला तुष्यातरंगाकुला

रागध्राहवती वितर्कविहगा वैर्यदुमध्यसिनी ॥

मोहावर्त्तसुदुस्तराजतिगहना प्रोत्तुंगचिन्तातटी

तस्याः पारगता विशुद्धमनसोर्नदन्ति योगीश्वराः ॥४५॥

आशा एक नदी है, उसमें इच्छा रूपी जल है ; तुष्या उस नदीकी तरंगें हैं, प्रीति उसके मगर हैं, तर्कवितर्क या दलीलें उसके पत्ती हैं, मोह उसके भँवर हैं; चिन्ता ही उसके किनारे हैं; वह आशा-नदी वैर्यरूपी वृक्षको गिरानेवाली है ; इस कारण उसके पार होना बड़ा कठिन है। जो शुद्धचित्त योगीश्वर उसके पार चले जाते हैं; वे बड़ा आनन्द उपभोग करते हैं ॥४५॥

नदीका नाम क्या है ? आशा-नदी। उसमें जल काहेका है ? इच्छाका। उसमें मगर कैसे हैं ? प्रीतिरूपी मगर हैं। उसमें जलचर पक्षी कैसे हैं ? नाना प्रकारके तर्कवितर्क उसके पक्षी हैं। वह किनारेके किन दूरवृक्षोंको गिराती है ? 'वैर्यरूपी