भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १५२ )

घूमता है। मन ही मनुष्यको परमात्मासे अलग रखता और मनही उसे उससे मिला देता है। मनकी चंचलता अच्छी नहीं। उसकी चंचलता ही साधनामें बाधक है। महात्मा कबीर कहते हैं—

मन-पक्षी तब लगि उड़े, विषय-वासना माँहि । ज्ञान-बाज़की भूपटमें, जब लगि आया नाँहि ॥ मनके बहुते रंग हैं, छिन-छिन मध्ये होय । एक रंगमें जो रहे, ऐसा बिरला कोय ॥ जेती लहर समुद्रकी, तेती मनकी दौर । सहजै हीरा ऊपजे, जो मन आवे ठौर ॥ मनके मते न चालिये, मनके मते अनेक । जो मन पर असवार हैं, ते साधु कोई एक ॥

उस्ताद जौक कहते हैं—

दुनियाँसे मैं अगर, दिले मुजतरको तोड़ दूँ । सारे तिलिस्म, बहम मुकहर को तोड़ दूँ ॥

संसारमें लगे हुए मनको यदि मैं तोड़ दूँ, तो धोके और बुराईमें डालनेवाले इस प्रपंचको ही तोड़ डालूँ। संसार-पाशमें बँधे हुए मनको तोड़ना मुश्किल है।

मन-पक्षी विषय-वासनाओंमें उस वक्त तक उड़ता है, जब तक वह ज्ञान-बाज़की भूपटमें नहीं आता। मतलब यह है